लुच्ची नजर, चुनिंदा नजारे- चश्मा आलोक पुराणिक का


अभय तिवारी की तमाम हसरतें पूरी होने को बेचैन रहती हैं। कानपुर में मिले तो बताइन कि उनके कोट पहनने की तमन्ना अधूरी रह गयी। एक दिन पाण्डेयेजी के ब्लाग में बोले -आप फ़ीड पूरी नहीं देते, आप तो ऐसे न थे। और आज सबसे नया दुखड़ा उनका यह सुना कि मनीषाजी ने उनको जीजू न कहा कभी। मनीषाजी ने तड़ से उनकी मांग पूरी कर दी यह कहते हुये:

अरे अभय, मुझे नहीं पता था कि आप इस बात को लेकर सेंटी हो जाएंगे। अभी भी क्‍या बिगड़ा है, अभी बुलाए देती हूं, जीजू। ठीक ना…..
वैसे अभय बोलना ज्‍यादा अच्‍छा लगता है। लगता है बड़ी हो गई हूं, बड़े लोगों के बराबर। इतनी कि सबको नाम लेकर बुलाती हूं।

लेकिन जीजा जी से यह न हुआ कि शरमाते हुये शुक्रिया कह दें।

इस बीच पुनीत ओमर जो हमारे कान्हैपुर के हैं ने पूना के किस्से लिखने शुरू किये हैं। आज उन्होंने पूना डायरी के किस्से बयान किये-

आसमानी रंग की सलवार, सुर्ख गुलाबी रंग का बूटी दार कुर्ता, और उसपर आसमानी रंग का ही दुपट्टा जिसपर हलके गुलाबी रंग के सितारे जड़े हुए हैं। अपने लंबे खुले बालों को आगे की ओर कुछ इस तरह से डाला हुआ है मानो की जैसे कुछ छिपाने की कोशिश हो. एकदम रंग पर जाती बिंदी, लंबे झुमके, और घुंघरू वाली चूडियाँ आसमानी-गुलाबी के इस “परफेक्ट गर्ली कौम्बीनेशन” पर और भी गजब ढा रही थीं.

आगे हम क्या बतायें। आप खुदै बांच लो।

कल पांडेयजी इतवार के दिन कोर्ट पहुंच गये और आज कार बनाने लगे। जुगाड़ू वाहन है यह।

सागर कभी रहे होंगे बात-बात पर टीन-टप्पर की तरह गर्म हो जाने वाले। लेकिन आजकल बड़े ज्ञानी हो गये हैं। पुलकोट लगाने का तरीका सिखाया कल। जिसे ज्ञानजी अमल में भी ले आये।
नीचे के एक-लाइना बांचने के पहले अर्चनाजी का ये पहला पाडकास्ट सुनेंगे!

आसमानी रंग की सलवार, सुर्ख गुलाबी रंग का बूटी दार कुर्ता, और उसपर आसमानी रंग का ही दुपट्टा जिसपर हलके गुलाबी रंग के सितारे जड़े हुए हैं। अपने लंबे खुले बालों को आगे की ओर कुछ इस तरह से डाला हुआ है मानो की जैसे कुछ छिपाने की कोशिश हो|

1.<a href=" http://anantraj.blogspot.com/2007/11/blog-post_18.html"अपनी जरूरतें दायरों में ही रखें: इस पर भी न काम बने तो धीरे से दायरा बढ़ा लें|
2. सवाल नंदीग्राम ही है..: सवाल तो समझ गये लेकिन जवाब क्या है?
3.लड़की की दिखाई रवीश कुमार के ब्लाग पर हो रही है।
4.ओह! तो अब ताजमहल नहीं रहेगा… अच्छा तो आप उस लिहाज से कह रहे हैं।
5. दुनिया के 200 अच्छे विश्वविद्यालयों में एक भी भारत का नहीं है: का जरूरत है। वहीं जाके पढ़ लेंगे।
6.बस जिये जाना! :अभय तिवारी ने नितान्त मूर्खता में ऐसा सोचा है।
7.बढ रहा देह व्यापार :और बड़ी तादाद में लड़कियां इस कारोबार की आ॓र आकर्षित हो रही हैं।
8. “भारत एक बिकाऊ और गया गुज़रा देश है, ये सच है”: आओ इस सच को झुठला दें! एक पोस्ट लिखकर!
9.अपने लेख को अखबारी लेख की शक्ल दें : कौन से अखबार की शक्ल दें? फ़ुरसतिया टाइम्स!
10. आज रात होगी उल्का पिण्डों की बारिश:सबेरे उठकर बटोर लेना!

अभय तिवारी की तमाम हसरतें पूरी होने को बेचैन रहती हैं। कानपुर में मिले तो बताइन कि उनके कोट पहनने की तमन्ना अधूरी रह गयी। एक दिन पाण्डेयेजी के ब्लाग में बोले -आप फ़ीड पूरी नहीं देते, आप तो ऐसे न थे। और आज सबसे नया दुखड़ा उनका यह सुना कि मनीषाजी ने उनको जीजू न कहा कभी।

11. खिचड़ी उपदेश कुशल बहुतेरे: जे बनावहिं ते ब्लागर न घनेरे।
12. क्या सारथी एक खिचडी चिट्ठा है?: हां , लेकिन बीरबल कहां निकल लिये!
13.हार का जश्न:हार के बादशाह ने महाशक्ति पर मनाया!
14.$2500 की कार भारत में ही सम्भव है!(?) : हम हर सम्भव को असम्भव बना देंगे।
15.लुच्ची नजर, चुनिंदा नजारे : आलोक पुराणिक के चश्मे से देखो। न दिखे तो बताओ, टिपियाओ।
16.क्रांति से ईश्वरों की गुहार : फ़ायर-फ़ाक्स पर दिखती नहीं हो जी!
17. कोहरा या अम्बर की आहें !: ये क्या है जरा देखकर बतायें, मुझे दिख नहीं रहा है पांच मीटर से।
18.सिसकते भाव : खिसक गये कोहरे में।
19. यात्रा ए हवाई: आइये तीसरी बार यात्रा पर चलें।
20.ब्लागिंग के साइड इफ़ेक्ट… : साईड इफेक्ट्स….और वाईड इफेक्ट्स तो इतिहास तय करेगा आप तो मौज लीजिए|

आगे अब आपके लिये छोड़ दिया मौज कीजिये। मौज लीजिये। जरा सा मुस्कराइये देखिये कित्ते हसीन लग रहे हैं आप। ये भी ब्लागिंग का एक साइड इफ़ेक्ट है।

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6 Responses to लुच्ची नजर, चुनिंदा नजारे- चश्मा आलोक पुराणिक का

  1. प्रिय अनूप,बहुत खूब! लगता है कि कल रात से काम कर रहे थे जिससे कि आज सुबह सुबह यह तोहफा चिट्ठाकारों को दे सको!!बाकि चिट्ठा-चर्चाई लोग भी आपके समान गतिमान हो जायें तो यह चिट्ठा रोज ही चिट्ठाजगत में छाया रहेगा — — शास्त्री हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

  2. ALOK PURANIK कहते हैं:

    बहुत बढ़िया है जी। आलोक पुराणिक का सिर्फ चश्मा नहीं, वो तो समूचे ही लुच्चे हैं जी। सही पकड़ा है जी। इसे रेगुलर क्यों नहीं करतेजी। कम से कम साप्ताहिक तो कर ही दीजियेजी।

  3. हर्षवर्धन कहते हैं:

    अनूपजीबड़ी पैनी नजर है आपकी। पुराणिक पुराण से मैं सहमत हूं। साप्ताहिक चर्चा तो आ ही जाए।

  4. anitakumar कहते हैं:

    अनूप जी मैं बिल्कुल सहमत हूं हर्ष जी से, बड़ी लुच्ची नजर है जी आप की कहां कहां घूमती है, और कितनी पैनी, अब इसका लुत्फ़ उठाने के लिए कम से कम इसे साप्ताहिक फ़ीचर तो कर ही दिजिए

  5. शैल छाया कहते हैं:

    achha hai ji. kafi jankari mili hamko bhi ki kahan kya ho raha hai..

  6. पुनीत ओमर कहते हैं:

    का बात है जी.. हमका तो पता ही नाहीं था की हमहूँ इत्ता पापुलर हुई गवा हूँ की इधर भी हमारा नाम आ गवा. आप ने पसंद किया इसके लिए हार्दिक धन्यवाद. आगे भी स्नेह और आशीर्वाद बनाए रखे.

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