एक अलिंकित चर्चा

महाशक्ति पर प्रमेन्द्र प्रताप सिंह लिखते हैं ” कुछ दिनों पूर्व देखने में आया था कि कुछ चिट्ठाकारों के द्वारा अप्रत्‍यक्ष रूप से महाशक्ति का बहिस्‍कार किया जा रहा था और इसकी छाप निश्चित रूप से चिट्ठाचर्चा पर दिखती है।”

तो लिंकित मन की एक पोस्ट पर जगदीश भाटिया टिप्पड़ी करते हैं “यहां यह देखना भी जरूरी होगा कि चिट्ठाचर्चा न होने से भी क्या पाठकों में कमी आयी है? इससे मेरी इस भावना को बल मिलेगा कि आने वाले समय में एग्रीगेटरों से ज्यादा चिट्ठाचर्चा का महत्व होगा।”

दोनों ही बातों का केन्द्रीयभाव यह है कि चिट्ठाचर्चा नियमित हो, निष्पक्ष हो, शसक्त हो और सर्वसमावेशक हो. पहले तो मैं प्रमेन्द्र से क्षमाप्रर्थी हूं कि अपनी पिछली दो चर्चाओं के दौरान मैं उनका उल्लेख नहीं कर सका. यह मेरी नासमझी और नादानी है. और संयोग कहें या दुर्योग कि मसिजीवी की चर्चा के बाद लगातार दो चर्चाएं मैंने ही की हैं. इस दौर में कोई नाराज होता है तो इसकी सारी जिम्मेदारी मेरी है. हो सके तो मुझे माफ कर देना प्रमेन्द्र और उन सभी से मैं क्षमा चाहता हूं जिनके चिट्ठों का उल्लेख मैं नहीं कर सका.

हिन्दी चिट्ठासंसार कई मायनों में अनोखा है. यहां दिल की जुबान बोली जाती है. शायद इसीलिए रूठने-मनाने का एक अंतहीन सिलसिला चलता ही रहता है. मानों कोई गृहस्थी है. एक तरफ से सम्भारो तो दूसरी ओर से दरकने लगती है. दूसरी ओर सम्हारो तो तीसरा कोना भसकने लगता है. और यह सब होते हुए भी कोई गृहस्थी का त्याग नहीं करता. शायद इसीलिए गृहस्थी अन्य तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, सन्यास) से श्रेष्ठ है.

यह आत्मीयता का परिचायक है. अहिंसा का जन्म इसी भाव से होता है और भारतीय परिवार में इसकी ट्रेनिंग जन्मजात होती है. मां ने खाने में देर की तो रूठकर बैठ गये. बाप ने कोई मांग पूरी नहीं की रूठकर घर से चार कदम दूर जा खड़े हुए. हम इसकी परिभाषा भले न कर पायें लेकिन हम जानते हैं कि अन्न का दाना मेरे पेट में नहीं जाएगा लेकिन तड़प उसे होगी. और अपनेपने का यही भाव हमारे सत्याग्रह का आधार बन जाता है.

यह सत्याग्रह चलता रहे. और केवल गलबहियां ही क्यों कभी मन करे तो तकरार के गरारे का भी आनंद लिया जा सकता है. आखिर हम सबके अंदर शिशुवत कोमल हृदय तो है ही. इष्टदेव की एक कविता इन भावों को ज्यादा सटीकता से बयां करती है कि –

न डरना शेर की दहाड़ से
और बकरी के मिमियाने से डर जाना.
गिर पड़ना आंगन में ठुमकते हुए,
हौसला रखना फिर भी एवरेस्ट के शिखरों पर फतह की.
न समझ पाना छोटी-छोटी बातें और
बेझिझक सुझाना बेहद मुश्किल मसलों के हल.
सूखे हुए पौधों वाले गमलों में डालना पानी,
नोच लेना नए बौर.
रूठ जाना बेबात
और फिर न मानना किसी के मनाने से.
खुश हो जाना ऐसे ही किसी बात से.
डूब जाना किसी भी सोच में,
वैसे बिल्कुल न समझना
दादी किसकी चिन्ता करती हैं बेकार,
दादा क्या सोचते रहते हैं लगातार?

आखिर में एक बात कहे देता हूं, कान खोलकर सुन लो, जाने की बात कभी न करना कोई भी. यहां से जाएं आपके दुश्मन.

क्या कहा?
कौन?
दुश्मन नंबर एक मैं ही हूं….

तो ठीक है यह लो अपनी लकुटि कमरिया, मैं तो चला… नमस्ते…

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attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि चिट्ठाचर्चा, संजय तिवारी में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

4 Responses to एक अलिंकित चर्चा

  1. परमजीत बाली कहते हैं:

    संजय जी,आपने स्पष्टीकरण दे कर अच्छा किया है। चिटठाकारों का यह समुह एक परिवार ही तो है।अब तो महाशक्ति को भी मान जाना ही पड़ेगा।रूठे हुए प्रमेन्द्र जी अब तो मन जाओ।और संजय जी आप किसे कह रहे हैं दुश्मन नंबर एक…ऐसा अशुभ बोल तो ना बोले।ये नोक-झोक तो चलती रहेगी। अंत मे सब मिल के कहो- चिटठा परिवार…जिन्दाबाद!

  2. अनूप शुक्ला कहते हैं:

    अरे वाह्, क्या शानदार् चर्चा है।

  3. Udan Tashtari कहते हैं:

    बहुत बेहतरीन अलिंकित चर्चा कर गये भाई. बधाई.

  4. Isht Deo Sankrityaayan कहते हैं:

    जब इतनी छोटी चर्चा करिएगा तो बहुत लोगों का छूटना तो स्वाभाविक ही है. और जब बहुत लोग छूट जाएँगे तो बहुत लोग नाराज भी होंगे. ऊपर से आप लिंकियाइएगा भी नहीं और फिर कहेंगे कि मैं तो चला. वाह भाई वाह संजय जी! आप तो सच्मुच्चे महाभारत वाले हो गए जी. आप की इसी बात पर मुझे श्रीकृष्ण तिवारी का एक गीत याद आ रहा है :कुछ ऎसी भी ट्रेनें होती हैं जो शहरों से शहरों केरिश्ते धोती हैं. हम ठहरे एक अदद लल्लू स्टेशन जो एक बार छूटे तो कई बार छूटे हैं एक बार टूटे तो कई बार टूटे हैं.

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