हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं

हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं”, आपको ये पंक्तियाँ याद होगी, आज मजरूह सुल्‍तानपुरी की बरसी पर उनके जीवन-काल का संक्षिप्त ब्योरा लेकर हाज़िर हुए हैं श्री यूनुस ख़ान अपने चिट्ठे रेडियो-वाणी में तो गौरव प्रताप गुनगुना रहें है “मिदहतुल अख्तर” की ग़ज़ल –

आग पूरी कहाँ बुझी है अभी
दीदा-ए-तर में तिश्नगी है अभी

यदि आप चिट्ठा लिखते है तो भोमियो की शरण में अवश्य जायें, भाषा का बंधन ही खत्म हो जायेगा, आपको जो भाषा आती है आप उसी में लिख डालें, भोमियो है ना! काकेशजी को भोमियो के शरण में जाते ही उड़िया में टिप्पणी मिली है, क्या पता आपके चिट्ठे पर भी अन्य भाषाई पाठकों की बाढ़ आ जाये। साथ ही देखियेगा क्या है आज का जुगाड़ भी, आखिर चिट्ठाकारी में जुगाड़ों का भी तो महत्व है।

अक्षरग्राम समूह छायाचित्रकारों के लिये एक ख़ुशख़बरी लेकर हाज़िर हुआ है, अब छायाचित्रकार सामूहिक रूप से अनुपम तस्वीरें एक ही जगह पर संकलित कर सकेंगे। प्रतिबिम्ब हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए एक सामूहिक फोटोब्लॉग का कार्य करेगा; जिसमे ब्लॉगर स्वयं रजिस्टर करके, अपने द्वारा खींचे गए चित्र डाल सकता है। सभी छवियों (फोटोग्राफ़्स) को विभिन्न श्रेणियों मे बाँटा गया है, ताकि देखने वाले अलग-अलग तरीके से चित्रों का अवलोकन कर सकें। यदि आपको फोटोग्राफी का शौक है तो रजिस्टर करने मे देर मत करिए।

भौतिकी के नियमों की नई व्याख्या लेकर अपने बिहारी बाबू भी “मस्ती की बस्ती” में आ धमके है, बस्ती में चार चाँद लगा दिये है उनकी इस पोस्ट ने –

‘जौं जौं मुर्गी मोटानी, तौं तौं दुम सिकुड़ानी।’ कहने का मतलब यह कि जब मुर्गियां छोटी होती हैं, तो उनकी दुम (अगर होती है, तो) मोटी होती है, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़ी व मोटी होती जाती हैं, उनकी दुम सिकुड़ती चली जाती है। आजकल के बच्चों को ही, समय के साथ मुर्गियों जैसे ही उनकी दुम भी सिकुड़ रही है। नए जमाने के बच्चे अभिमन्यु की तरह गर्भ से हीबहुत कुछ सीखकर आते हैं। आज के तीन-चार साल के बच्चों में जितनी अक्ल होती है, आज से बीस-तीस पहले अगर इस उम्र में इतनी अक्ल होती, तो पता नहीं अपना देश कहां चला गया होता!

कुछ समय पहले गुजरात सुलग उठा था आज ऐसी ही स्थिति पंजाब में बन रही है, ऐसे में कवि कुलवंत जैसे व्यक्तियों का ऐसी इंसानी फितरत पर दुखी होना जायज ही लगता है –

भाषा, मजहब, जात के नाम,
ईर्ष्या, द्वेष, वैमनस्य हो काम,
मक्का, मदीना, तीर्थ हो धाम।
लड़ना ही है क्या इंसान की फितरत?
.
बांग्ला, द्रविण, उर्दू, हिंदी,
मुस्लिम, हिंदू, इसाई, यहूदी,
सिया, सुन्नी, वहाबी, विर्दी,
लड़ना ही है क्या इंसान की फितरत?

नोडपेड पर फिर से हलचल शुरू हो गई है, इस बार कुड़ादान की कविता (जो कुड़ा में जाने से पूर्व साईबर पिता को सौंप दी गई है) के साथ अपने भाव दर्शाने का प्रयास, साथ ही गैर काव्य-प्रेमियों के प्रकोप से बचने की व्यवस्था भी (भूमिका में)…लगता है हमारे गुरूदेव से विशेष ट्रेनिंग ली है।

संजीव तिवारी अंतर्जाल के हिन्दी चिट्ठों और उनके पाठकों की संख्या को लेकर विश्लेषण करने लगे। एक अच्छा विश्लेषण किया मगर एक चूक कर गये, नारद पर लोकप्रियता को लेकर लगा डिस्कलेमर नहीं पढ़ा (शायद), बस फिर क्या था, ताऊ आ गये वहीं पर डिस्कलेमर लेकर –

आपने पूरा लेख तो लिख दिया, लेकिन लोकप्रियता वाले उस लिंक पर लिखा डिसक्लेमर नही पढा:

साथियों हम पेश है लोकप्रिय लेख की कडियों के साथ। लेकिन इसके पहले हम कुछ कहना चाहेंगे। लोकप्रिय लेख का पैमाना नारद के हिट्स काउन्टर कभी नही हो सकता, हम यहाँ पर सिर्फ़ वही दिखा रहे है जो कम्पयूटर के गणना के अनुसार हमारे पास है। इस गणना का आधार नारद के हिट्स काउन्टर है, अर्थात नारद की साइट से आपके ब्लॉग पर भेजे गए लोगों की संख्या के अनुसार लोकप्रिय लेख।

अगली बार आप किसी विषय पर लेख लिखें, तो पूरी जानकारी अवश्य लें, किसी पूर्वाग्रह या कुंठा से लेख मत लिखें।

डॉ. गरिमा आजकल जीवन-ऊर्जा को चिट्ठे में संजोकर रखने का प्रयास कर रही है, आज जब हम देखने गये कि वहाँ नया माल क्या है, चर्चा करने को, तो हमें वहीं बैठना पड़ गया। प्रभामंडल की क्लास लगी थी, हम तो ध्यान में लग गये। मगर चर्चा भी करनी थी, क्या करता? डॉ. साहिबा को भेज दिया जिन्दगी का सार पता करने के लिये। अब आप देखिये, जिन्दगी का सार, डॉ. गरिमा की नज़र में –

जिंदगी कई आयामो से मिलकर बनी हैं, सुना है कि सुख और दुख का ही मेल है जिन्दगी… पर उनका क्या जो सुख के अभिव्यक्ति से भी दूर है, शायद सुख ही उनकी इहलीला समाप्त होने का कारण भी बन जाता है… इसे दैवयोग कहेंगे कि हमारे सामाजिक व्यवस्था कि दुर्बलता.. या किसी और प्रसंग का नाम देंगे। आपके खयाल मे क्या आया जरूर बताईयेगा… पर जैसा कि मैने कहा जिंदगी कई आयामो से मिलकर बनी है.. ऐसे आयाम का एक गुदगुदाता हिस्सा यह भी है… जो लेखक और लेख के बीच मे जन्मदात्री और बच्चे
का सम्बन्ध
स्थापित कर रहा है… आगे खूद जानिये

अगडम बगडम जादु का तिगडम ऐसे बहुत से कहानियाँ सुनी थी और उसे अपने तरीके से समझा भी था… पर ये क्या यहाँ तो तरीको की बौशार हो गयी… और मेरे तरीके गायब… मै चलती हूँ आगे वरना मै भी गायब… डरिये नही मजेदार कहानी है… आप पढिये और देखिये…

आप आनन्द ले और हम आगे बढे, जिंदगी के नये आयम समझने … जिंदगी के विभिन्न आयामो को समझा रही हैं रंजना जी .. प्यार, विरह, प्रेरणा सबकुछ तो है यहाँ

अब जिंदगी की अभिव्यक्ति की जा रही है और उसके मुहावरो को मेल ना हो तो अभिव्यक्ति अधुरी सी लगेगी…. अधुरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है… तो हम पूरे ज्ञान को ही पायें अधुरे मे क्यूँ रह जाये… आईये इस दुनियाँ मे भी सैर कर आयें।

कहते हैं, जिन्दगी मे पैसा ही सबकुछ नही होता, पर इसके बिना भाई कुछ भी नही होता, ये बात तो अजदक जी के लेख से साबीत हो चुका है, अब आसानी से पैसे कैसे कमाये… देखिये और जानिये… पैसे कमा लिये अब पेठिया (बजार) से कुछ समान भी लाये.. लेकिन संभलकर सिर्फ समान ही लाईयेगा… पारो की खोज मे मत जाईयेगा 🙂

लगता है मनी कुछ ज्यादा हो गयी, इसलिये तो पेठिया मे समान खरीदने के बाद भी शराब पर उडाने के लिये है… ममता जी को धन्यवाद की ऐसे बिगडैल लोगो को सुधारने के काम मे जुटी है और उनके जिंदगी को नये आयाम देने के कोशिश मे हैं… उनकी कोशिश को जरूर देखें

अच्छी सराहनीय कोशिश… पर कुछ कोशिशे इतनी बेकार क्यूँ… और उस पर भी उनकी
(मिडिया) कि जो हमे अपनी आपाधापी जिन्दगी मे देश-विदेश से समचारो से जोडने का काम करती है… इनके कुछ कोशिशो से तिलमिला कर उमा शंकर जी ने जो लिखा है…. सच का आईना है… किसी का जीवन, किसी का तमाशा..और उस तमाशा से चिढे एक और जन … जिंदगी सिर्फ तमाशा ही नही, आशा भी है और निराशा भी… वफा भी है, बेवफाई ही है.. गम से अपनी लडाई भी है… जिंदगी समझौता भी है, जिंदगी सोच भी है.. और नयी सोच को जन्म दे कारण भी है, जिन्दगी विश्वास है, और जिन्दा और खुस रहने का प्रयास है, सुकून की तलाश है… और शायद कला जिंदगी मे कुछ पल सुकून के दे जाने मे समर्थ भी है, तभी तो यहा कितने लेखक विचारक कवि कवियत्री है… पर कला का कुछ ऐसा भी रूप होता जा रहा है, जिन पर उठे ऐसे विवाद की अब तक शांत न हूए ना ही किसी किनारे लगे।

विवादो मे उलझकर ही तो नही रह गये… जरा यहा नजर दौडाईये और कुछ मजेदार पल (समाचार) पाईये क्यूँकि जो एक ठौर ना रूके वही तो जिन्दगी है… है ना मजेदार… अर्रे र्रे ये क्या.. खिन्न ना हो.. जिंदगी है.. यहा कब किस मोड पर किसे कौन सी बात लग जाये कौन जानता है, पर मुझे इनका अपनी खिन्नता प्रदर्शन करने का ढंग पसन्द आया… जैसा की कहा एक ठौर जो ना रूके वो ही जिन्दगी है… तो एक नये दौर मे चलते है…(तकनीकी क्षेत्र मे) और जानते है कि हमारे ये पन्ने गुगलदेव के किस पन्ने पर आते हैं

चलते-चलते कैसे हम खिन्न हो जाते, अपनी बात बताने के लिये या यूँ कहिये छुपाने के लिये मुखौटे तक लगा लेते है… इन मुखौटो से भी खिन्नता जो दिखती है देखिये .. ओह! ये कडी थमी नही फिर वही! जिंदगी पर लिखते लिखते हम थक गये भईया… आप भी पढ पढ के थक गये होंगे, तो थोड विश्राम करते हैं और एक कविता सुनते हैं , फिर आगे बढेंगे… कविता सुन ली तो आओ थोडा तेहरान घुम भी आते हैं।

अब हम फ्रेश है घुम-फिरकर फिर अपने जिंदगी वाले मुद्दे पर आते है… हाँ तो हम जिंदगी के मायने बता रहे थे, और बता रहे थे कि रास्ते से देखिये और अपनी प्रतिक्रिया भी बताइये.. बात बात तक रहे तो काफी होती है, आप कहेंगे.. हद हो गयी… लेकिन नही.. अगर इंसान दुखी ही रहे तो जो अच्छा कर सकता है वो भी नही कर पायेगा। जो खूद रोयेग दुसरो को क्या हँसायेगा, इसलिये तो हम पिक्चर देखने जा रहे हैं, फिर आके आगे का हाल बतायेंगे.. आप भी सुनिये कौन सी पिक्चर है.. इसके साथ एक कविता बिलकुल मुफ़्त है।

मजा आया ना… कुल मिलाकर यही तो जिन्दगी है… गम, खुशी, आप, हम… मिलकर बनाते है जिंदगी।

दीपक भारतदीप बता रहें है कि हमें परनिन्दा क्यों नहीं करनी चाहिये।

बात पते की में पंजाब में अमन की कामना

हरिरामजी बता रहें है तपती गर्मी में बहुमंजिली इमारतों को शीतल रखने का सरल उपाय

वोल्फोवित्ज के प्रेम को प्रमोट करना जायज है, देखियेगा बिहारी बाबू का व्यंग्य “बदनाम का हुए, नाम हो गया!

आईये अब चलते हैं गुरूदेव के मयख़ाने में, दो घूंट उतारकर गला तर कर लिया जाये।

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यह प्रविष्टि गिरिराज जोशी "कविराज" में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

5 Responses to हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं

  1. अनूप शुक्ला कहते हैं:

    भाई जोशीजी, इतने दिन बाद चर्चा पढ़ने का सुख बहुत मन भावन है। सबेरे जिन चिट्ठों को आराम सेपढ़ने के लिये छोड़ दिया था अब उनका जिक्र फ़िर सेउनको पढ़ने के लिये मजबूर कर रहा है। बेहतरीन चर्चा! नियमित करते रहो भाई!

  2. Udan Tashtari कहते हैं:

    बहुत बढ़िया कार्य किया, कविराज. हम तो दो दिन से दफ्तर में फंसे हैं. कोशिश करके भी चर्चा नहीं कर पा रहे हैं. बढ़िया रही चर्चा.

  3. रंजू कहते हैं:

    बहुत ख़ूब .सबके बारे में पढ़ लिया

  4. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    गला तर कर टिप्पीया रहे हैं. हिक्क्क…मस्त चर्चा.

  5. हरिराम कहते हैं:

    कुशल समीक्षक हैं आप! सबकी कुण्डलियाँ बाँच कर तत्काल फलादेश दे पाते हैं। आभारी हैं हम सब आपके!

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