आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जा

एक बार कुछ समय पहले महाशक्ति प्रमेन्द्र प्रताप सिंग ने एक तस्वीर पेश की थी आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जा .बड़े लोग गाड़ी में चढ़ने को उत्सुक थे मगर गाड़ी रुकी ही नहीं, वो तो अपनी गति से भागती रही. जो भी दिखा, बस कह दिया आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जा. अरे, जब रोकोगे नहीं तो बैठेंगे कैसे और किसी ने भी उसकी रफ्तार से रफ्तार मिलाकर भाग कर उसे पकड़ने की कोशिश नहीं करता, बस एक ही रोना, गाड़ी रुकी नहीं तो चढ़ें कैसे.

वैसी ही गाड़ी चिट्ठा चर्चा भी बन गई. अपनी गति और अपने रंग रुप में भागी चली जा रही है. सबसे कह रही है, आओ, चर्चा करो. मगर लोग हैं कि बस चढ़ना ही नहीं चाहते. रफ्तार से रफ्तार कोई मिलाता ही नहीं. बस कहते है कि बस रुकी ही नहीं, कैसे चढ़ें. लेकिन बस की चाल ठीक नहीं दिखती. लोग अपनी खुद की गाड़ी लेकर उसी दिशा में निकल पड़े मगर चलती गाड़ी में रफ्तार मिला कर बैठे नहीं. पहली गाड़ी में जगह है मगर फिर भी अपनी गाड़ी लेकर निकले. राष्ट्रीय संसाधनों का कितना बड़ा दुरुपयोग. मगर क्या करना यह सब सोच कर. चल पड़ो किसी भी दिशा में. खैर, हम इस विषय में क्या कहें, बस यही कह सकते हैं कि भईया, आप आमंत्रित हैं, आप युवा हैं. आप की नई सोच है. आप में बदलाव लाने की क्षमता है. हमें आपका चिट्ठाचर्चा मंडली में इंतजार है और आपका स्वागत है. ट्रेन में बैठकर मच्छर के काटे को भी भारत सरकार का दोष मानकर कोसना तो अब आदत सी बात हो गई है, मगर चलो, इसमें कोइ बदलाव लायें. थोड़ा फ्लिट हमीं छिड़क दें अगर सरकार नहीं छिड़क रही है तो.

अरे, मैं भी इतने खुशनुमा दिन पर ऐसी बात लेकर बैठ गया.

आज फुरसतिया जी बाली उमर में (बकौल ई-स्वामी) ससुर हो गये. आज उनकी भतीजी स्वाति चि. निष्काम के साथ परिणय बंधन में बंध गई. उन्होने समस्त चिट्ठाकारों को खुला निमंत्रण दिया और अमिताभ की तरह का कोइ बंधन नहीं डाला. अब सब को निमंत्रित किया है तो सब की तरफ से स्वाति और निष्काम को अनेकोम शुभकामनायें.

एक और खुशखबरी: आज से पॉडभारती की शुरुवात हुई है. जैसे मानो कि आप सुनते थे विविध भारती, वैसी ही. शशि सिंह कहते हैं:

पॉडपत्रिका पॉडभारती का पहला अंक जारी कर दिया गया है। कार्यक्रम का संचालन किया है देबाशीष चक्रवर्ती ने और परिकल्पना है देबाशीष और शशि सिंह की।

इसमें आपको फुरसतिया, रवि रतलामी, देवाशीष, शशि सिंह, संजय बेंगाणी, रविश और यहाँ तक कि अविनाश की, सबकी आवाज सुनाई देगी फिर भी आपको खेद रहेगा कि आप हमारी आवाज नहीं सुन पाये. शायद हमारी किस्मत ही खराब है जो शशि भाई ने हमें इस लायक नहीं समझा कि हमारी एक कविता ही डाल देते इस अंक में. मगर मैं नाराज नहीं हूँ इसीलिये तो कवर कर रहा हूँ यहाँ पर. 🙂 मेरी किस्मत कि मैं इतिहास का हिस्सा बन ही नहीं पाता.

सब छोडो, यह देखो कि डॉ. प्रभात टंडन जी, कुछ दोहे लेकर जिन्हें आवाज़ दी है जगजीत सिंग ने, हमारी खिदमत में लेकर हाजिर हुये हैं, यह तो शशि सिंह से बेहतर कहलाये कि हमारी पसंद लाये.

कवि बड़ा या कविता के बारे में घघूति बसुति जी ने बात क्या की और साथ ही अभय तिवारी मंत्र कविता..लेकर आये …कहते हुये कि सदी की सबसे महान कविता जिसे लिखा है बाबा नागार्जुन नें. हमें तो बहुत पसंद आई, यह अभय की आदत खराब है कि हमेशा हमें पसंद आने वाली ही बात करते हैं. मगर इस पर काकेश को सुनें, कविता तो बेहतरीन है: कवि कविता और इन्ची टेप..सदी की सबसे बरबाद कविता

और ममता जी को सुनें, माँ बुरा न मान गई हों, उस पर दुखी हैं. अरे माँ भी कभी बच्चों की बात पर बुरा मानती है क्या. हद कर दी:. भूल जाओ ये सब. कह भी रही हैं:

ये एक ऐसा शब्द है जिसकी महत्ता ना तो कभी कोई आंक सका है और ना ही कभी कोई आंक सकता है। इस शब्द मे जितना प्यार है उतना प्यार शायद ही किसी और शब्द मे होगा। माँ जो अपने बच्चों को प्यार और दुलार से बड़ा करती है। अपनी परवाह ना करते हुए बच्चों की खुशियों के लिए हमेशा प्रयत्न और प्रार्थना करती है और जिसके लिए अपने बच्चों की ख़ुशी से बढकर दुनिया मे और कोई चीज नही है।

शहाबुद्दीन को सजा मिल गई जो सबकी इच्छा थी, इस पर बिहारी बाबू कहिन कहते है कि शहाबुद्दीन को सजा: कानून नहीं, सत्ता की जीत है. अब उनकी मरजी, जो कह दें.

अमित चल गई…चल गई चिल्लाये. हम समझे कि गोली वगैरह चल गई. भागे देखने तब मालूम चला कि मोबाईल पर हिन्दी चल गई. वाह भई, शीर्षक महात्म.

अच्छा अब मन भर गया हो तो ऐसे ही बहलावे के लिये कविता नुमा रीतेश की बात सुनो. बेचारे, हमेशा मेहनत कर आपके लिये कुछ न कुछ लाते रहते हैं. आज ला्ये हैं श्रीमान श्रीमती…

ऐसा और कहाँ…. अतुल श्रीवास्तव (लखनऊ वासी..अब अमेरीका में..) अब लिखें हैं दिल्ली से वो भी बहुत दिन बाद.

सिरफिरा है वक्त सजीव सराठे की रचना भी जरुर पढ़ियेगा.

उदासी की नर्म दस्तक ,
होती है दिल पे हर शाम ,
और गम की गहरी परछाईयाँ ,
तनहाईयों का हाथ थामे ,
चली आती है –
किसी की भीगी याद ,
आखों मे आती है ,
अश्कों मे बिखर जाती है ।

पुरकैफ-ए-मंजर की रचना भी हम यहॉ पेश कर रहे हैं: एक बाप की मौत

राकेश खंडेलवाल गीत कलश पर : दो कदम जो चले तुम मेरे साथ में…यह तो जरुर ही जरुर पढ़ें, हम भी पढ़ेंगे:

ये जो दीवार पर है कलेंडर टँगा
आज भी बस दिवस वो ही दिखला रहा
तुमने मुझसे कहा था कि”मैं प्रीत के
कुछ नये अर्थ तुमको हूँ सिखला रहा”
वह दिवस वह निमिष अब शिलालेख हैं
मेरी सुधियों के रंगीन इतिहास में
मेरी परछाईयों में घुल हर घड़ी
तुम रहो दूर या मेरे भुजपाश में

अब समझने लगा, अर्थ सारे छुपे
और अभिप्राय, हर अनकही बात में……..

आगे वहीं जाकर पढ़िये.

प्रगीत कुँअर जी का संस्मरणात्मक आलेख जोशी जी पेश किया है भावना कुँवर जी ने. मजा आ जायेगा पढ़कर.

अभिनव को सुनो, लो जी पतले हो जाओ. यह वही हैं जो कभी मोटों की शान में कशीदे कसा करते थे मुट्टम मन्त्र सुना कर. कवि हैं कि नेता. बस पलट गये बात से. अब पतलम मंत्र दे रहे हैं. कहीं रामदेव टाईप कुछ बनने के जुगाड में तो नहीं.

नापोली की चित्रमय झलकियाँ देखिये राम चन्द्र मिश्र जी के ब्लॉग पर.

इंडिया टीवी की खिचडी हिन्दी से परेशान पंकज बेंगाणी अपनी गाथा का बखान कर रहे हैं.

हमारे रवि रतलामी जी बबली तेरो मोबाइल की टिप्पणियों की संख्या गिनाते गिनाते इतने छ्त्तीसगढ़ी यूट्यूब पेश किये बस उसी में सारा वक्त निकल गया और अभी भी दो बाकी हैं, फिर भी झूठ ही टिपिया आये कि सब देख लिये, मजा आया. मजा फिर कभी समय मिलते ही ले लेंगे. आज जिनके भी चिट्ठे छूटें वो रवि भाई को पकड़ें, उन्होंने ही फंसा कर रखा था यूट्यूब में, वरना तो हम सोचे थे कि आज एक भी नहीं छोड़ेंगे.

मनीषा किसी सर्वेक्षण की रिपोर्ट पा गई हैं और कहती है कि व्यभिचार में आगे हैं पुरुष. पता नहीं इस पर सर्वेक्षण की आवश्यता किस भद्र पुरुष को हुई. उम्मीद करता हूँ कि कुछ ऐसा ही कदम कोई महिला सर्वेक्षण कर्ता भी उठायेंगी, दूसरे पक्ष की भूमिका दर्शाने को.

मस्ती की बस्ती पर राजेन्द्र त्यागी का व्यंग्य : बुद्धिजीवी बनाम बुद्धूजीवी और हमारे प्रिय व्यंग्यकार आलोक पुराणिक जी का सद्दाम और चार कट्टे यहाँ पढ़ें.

रमा जी की रचना क्या खोया? क्या पाया? का दर्शन देखना न भूलें और साथ ही मोहिन्दर जी रचना भी: तेरा खत हम पर इनायत होगी.

अब चला जाये, आवश्यकतानुरुप कवरेज हो गई है बाकि गाड़ी चल रही है, रफ्तार मिलाओ और लद लो और टिपियाते चलो…सिर्फ पढ़्ना बस काफी नहीं है, बताओ भी तो कि पढ़ लिया है.

पता नहीं अपने गुट का कोई छूट तो नहीं गया?? बताना जरा!!!

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यह प्रविष्टि उड़न तश्तरी, चिट्ठा चर्चा, समीर लाल, chitha charcha, chithacharcha में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

17 Responses to आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जा

  1. काकेश कहते हैं:

    अब हम आपके गुट के (गुटके जरूर हैं ) हैँ कि नहीँ ये तो पता नहीं . पर पढ् लिये हैंँ . अभी इतना ही . ये हिन्दिनी औजार मेँ कुछ मात्रा लगती ही नहीँ .

  2. अभिनव कहते हैं:

    अरे समीर भाईसाहब, हम कहाँ पतले हो रहे हैं, यह तो ज़ालिम दुनिया वाले हैं जो हमें दुबला करने पर तुले हैं। और हाँ पतलम मंत्र हमने नहीं हमारे छोटे भाईसाहब नें लिख कर भेजी है।चिट्ठा चर्चा पढ़कर आनंद आया।

  3. mamta कहते हैं:

    गाड़ी की सवारी करके मजा आया

  4. रंजु कहते हैं:

    गाड़ी की सवारी अच्छी थी :)..पर हमे सीट नही मिली इस बार … 🙂

  5. आलोक पुराणिक कहते हैं:

    मैं नन्हा-मुन्ना ब्लागर,सारे वरिष्ठों से प्रार्थना करता हूं कि मुझे अपने गुट में शामिल करें। सारे गुटों के प्रति मेरी प्रतिबद्धता रहेगी। अकबर इलाहाबादी का शेर मेरा सूत्र वाक्य रहेगा-ईमान की तुम मेरे क्या पूछती हो मुन्नीशिया के साथ शिया, सुन्नी के साथ सुन्नीप्लीज सारे गुट अपनी भर्ती एप्लीकेशन भेजेंआलोक पुराणिक

  6. notepad कहते हैं:

    उपस्थिति दर्ज की जाए । वैसे हमें कौन गुट मे रखे है समीर भाई ?:)

  7. गाड़ी चाली और चालक इस बार पुन: छूटा हैलगता जैसे मेजबान का न्यौता ही झूठा हैबिना आपको कवर किये बेकार पाड की वाणीलगता है जिसमें मथते वो भांडा फूटा है

  8. mahashakti कहते हैं:

    मै तो सोचा करता थाचिठ्ठा चर्चा मे होना मेरी चर्चाबड़ी दूर की सोच हैकिनतु बड़ी पुरानी पोस्‍ट की चर्चा देखकर मन खुश बड़ी जोर से।

  9. rachana कहते हैं:

    मै आपकी गाडी मे सैर कर चुकी हूं! इनकी, उनकी, सबकी ’रचना’ की चर्चा अच्छी रही!

  10. Manish कहते हैं:

    जानदार कवरेज रही ! बधाई 🙂

  11. sunita (shanoo) कहते हैं:

    गाड़ी बहुत ही बढिया थी,..सारे यात्री टिकिट लेकर बैठे थे…बस आपके गाड़ी में आप नही थे,…सुनीता(शानू)

  12. Reetesh Gupta कहते हैं:

    वाह लालाजी,अच्छा लगा पढ़कर ….बहुत मेहनत किये हो…धन्यवाद

  13. Udan Tashtari कहते हैं:

    @काकेश भाई- आप तो सब जानते हो!! काहे कहलवा रहे हो, मित्र.@ अभिनव- दुनिया की परवाह न करते हुये आगे बढ़े चलो, तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं. हम लोग मोटे नहीं हैं, बस दुबलेपन का आभाव है. ऐसा मान कर चलो, संतोष मिलता है.@ ममता जी- बस मजे के लिये निकाली थी सवारी. काम पूरा कहलाया. :)@ संजय भाई- चकाचक?? अरे, माद्ययान वाली में भी स्टार्टर लगाओ…कम तक बंद खड़ी रहेगी..जब भी मेरी पोस्ट दिखे, एक मध्दान चर्चा कर दें, काफी हैं, सब पाप धुल जायेंगे. :)@ रंजु जी- मैने देखा है हमेशा अपने खास ही छूट जाते हैं. विश्वास न हो तो पूछ लो राकेश भाई से. उनकी चर्चा के दिन हम सुनिश्चित होकर छूटे रहते हैं. आगे से एक कविता लिखना , दो बार चर्चा करुंगा. अब खुश..अब सवारी के अच्छे लगने का धन्यवाद. हौसला बढ़ जाता है.@ आलोक भाई- अरे, आप और नन्हे मुन्ने, तो बजरंगी कौन?? आप को कौनो फारम वारम की जरुरत नाही…आप से तो चर्चा शुरु होती है. आप तो दिये रहो अपने लेख..आनन्द आ जाता है…आप तो हमारे गुट के सरगना हो, आपकी क्या कहें :)@ सुजाता जी- कैसी बात करती हो…तुम और गुट…त्म तो सर्वव्यापी हो. हमारी चर्चा जरुर करना, बस. न पोस्ट मिले तो यह भी चलेगा कि आज समीर भाई नहीं लिखे हैं. 🙂

  14. Udan Tashtari कहते हैं:

    @ राकेश भाई- अब तो छूटने की ऐसी आदत लग है कि खुड से खुद ही छूट जाते हैं. आपका साधुवाद…हा हा 🙂 @ महाशक्ती प्रमेन्द्र भाई-अरे, तुम तो हमारे खास हो, तुम्हारी हर पोस्ट याद है भले ही टिपियाये न हों. खुश हुये तुम, अच्छा लगा. :)@ रचना जी- सैर कर नहीं चुकी हूँ, अभी बहुत सैर करना बाकी है. एक बार छूट्टी क्या दी, आप तो पूरी छुट्टी पर चली गईं. अगली बारी से फिर शुरु हो जायें…बाकी तो धन्यवाद. :)@ मनीष भाई: बहुत आभार.आप तो लेखनी के जादूगर हैं, आप भी यहाँ हाथ बंटायें तो बड़ा अच्छा लगेगा…इंतजार रहेगा आपके जबाब का.@ सुनीता जी—अरे आपके रहए हमारी क्या मजाल कि हम बैठें. तुरंत उतर गये. 😉 आपको बढ़िया लगा, गाड़ी की कीमत आसमान छूने लगी. :)@ रीतेश – चलो, किसी ने तो पहचाना कि मेहनत की है. यार, तुम न हो तो हम तो बस पिस कर रह जायें इन लोगों के बीच..और सब कहें कि अच्छा हुआ कुछ वजन कम हो गया. बहुत आभार. मित्रा, तुम बने रहो, हमारा काम भी चलता रहेगा. आते रहना, टेका देने. 🙂

  15. Mired Mirage कहते हैं:

    बहुत बढ़िया चर्चा रही । गाड़ी में बैठाने के लिए धन्यवाद ।घुघूती बासूती

  16. Udan Tashtari कहते हैं:

    घुघूति जीगाड़ी आपकी है, जब दिल चाहे, बैंठे. हम तो ड्राइवर का किरदार निभा रहे थे. चर्चा पसंद करने का आभार. स्नेह बनाये रखें.

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