एक चिट्ठे की चर्चा!!!

आज तो मैने ठान लिया है. आज मैं बस एक चिट्ठे की चर्चा करुँगा. ये जो रोज रोज ५० पोस्टें आ रही हैं, किस किस की बात करुँ. यह चिट्ठाजगत के लिये तो अच्छी बात है और मेरी शुभकामनायें हैं कि ५० की जगह ५०० हो जायें. भाँति भाँति के विषय पर पढ़ने मिलेगा. जितना पसंद आये पढ़ो, नहीं तो बत्ती बुता के सो जाओ. मगर जब चर्चा करने बैठो, तो इतनी तो नहीं की जा सकती है न!! कहीं तो सीमा निर्धारित करनी होगी कि एक बंदा इतनी ही चर्चा करेगा. सो हमने सीमा निर्धारित कर ली है कि एक चिट्ठे पर चर्चा करेंगे बस.

अब झंझट ये फंसी है कि वो एक कौन?

क्या मैं फुरसतिया जी का चयन करुँ, जो रिचर्ड गियर के द्वारा शिल्पा शेट्टी को लिये चुंबन का पोस्ट मार्टम कर रहे हैं.


क्या नज़ाकत है, कि फुरसतिया पीले पड़ गये
उसने तो बोसा लिया था रजामंद जागीर का.

अरे, भाई जी, दोनों की रजामंदी मे हो गया अह्हा, आनन्दम आनन्दम. अब आप लाख पोस्टमार्टम करेंगे अपने बेहतरीन अंदाज में तो हमें तो दो बार मजा आ जायेगा. एक बार जब उसने चूमा और एक बार जब आपने उस चुंबन को अपनी कलम से चूमा.

मगर फुरसतिया जी को तो सब नारद पर देखते ही पढ़ लेते हैं तो उनकी चर्चा क्या करना. किसी और को ही देखता हूँ.

एक बार दिल में आता है कि किसी कविता पर बात कर देता हूँ. आज तो कविता की तादाद भी ठीक ठाक है, उसी में से एक उठाता हूँ.

शैलेश भारतवासी को सुनाऊँ :


ज़िंदगी बस मौत का इंतज़ार है, और कुछ नहीं।
हर शख़्स हुस्न का बीमार है, और कुछ नहीं।।

या फिर मोहिन्दर भाई की रचना तो कोई बात नहीं हिन्द युग्म पर या कि फिर राजेश चेतन जी की दादा बी और उन्हीं की राहुल जी :


अपनी कॉपी खुद ही अब तो जांच रहे हैं राहुल जी
निज पुरखों की गरिमा को ही बांच रहे हैं राहुल जी
अटल बिहारी के शासन में रोड़ बने जो भारत में
अब उन पर क्यूं झूम झूम कर नाच रहे हैं राहुल जी

वैसे तो बात ही करना है तो मोहिन्दर जी अपने खुद के ब्लॉग पर भी कविता लिखें हैं:

छोड दुनिया के काम बखेडे,
आ बैठ, कुछ बात करें

उसी पर कर लें. मगर फिर लगता है कि नेता और नरक का द्वार भी तो बढ़िया कविता है और टू फेसेस जब धर्म वीर भारती जी सुनवा रहे हैं तो उन्हीं को सुनवा दें.

वैसे तो नये नये पधारे अरविंद चतुर्वेदी की कवरेज की बनती है इनकी पहली कविता के साथ: स्वर बदलना चाहिये मगर इसके चक्कर में रमा जी की हास्य रचना ‘चमचे का कमाल’ भी तो नहीं छोड़ी जा सकती. और जब एक हास्य रचना नहीं छोड़ी जा सकती तो दूसरे ने क्या पाप किया है. प्रॉमिस कि खतरनाक गोली को कैसे छोड़ दें. इनको नहीं छोड़ रहे तो दीपक बाबू कहिन को कैसे छोड़ सकते हो. क्या लिखे हैं: दर्द का व्यापार यहाँ होता है . वैसे, एक बात ज्ञान की बताता हूँ, आपने हर चीज में आत्म निर्भरता देखी होगी , मगर अगर टिप्पणी पाने मे आत्म निर्भरता का रिकार्ड देखना हो तो दीपक बाबू के चिट्ठे पर जरुर जायें. हर पोस्ट पर पहली टिप्पणी खुद की…जिन पर भी सिर्फ़ एक टिप्पणी है. इत्मिनान से मान लें कि इनकी खुद की है. अरे, कुछ तो सीखो बंदे से….फाल्तू ईमेल भेजते हो कि भईया टिपिया दिजियेगा…..अरे, खुद काहे नहीं टिपिया लेते, दीपक की तरह. मुझे उम्मीद है कि यह कृत चिट्ठा समाज में एक नई अलख जलायेगा—जय अलख निरंजन!!!

चलो, हिम्मत करके इनकी भी न बात करे, जब एक ही करनी है और वो भी कविता में तो हाशिये की करते हैं…अपना देश एक खस्सी है और अगर वो भी न जमती हो तो फिर तो कोई और कविता है नहीं, गद्य पर ही जाना होगा.

मगर गद्य में भी कौन..कोई एक..बड़ा मुश्किल है फिर भी कोशिश तो करते हैं: कमल कहते है NTPC खरीद लो. गारंटी शून्य है तो इनको छोड़ देते हैं. रेल्वे स्टेशन पर पलते बच्चे पर ज्ञानदत्त जी का आख्यान भी बेहतरीन है, काहे छोडूं मगर फिर क्या विकास की मजनूँ पुराण न कवर करूँ. बड़ा डूब कर आत्ममंथन करते हुए लिखा गया है. यह मेरे बस में नहीं है.

मेरे बस में तो यह भी नहीं कि राजलेख जी अपना दर्द सुनाने चले तो उन्हें छोड़ दें. मगर क्या करें जब एक ही पोस्ट की बात करना है तो अरुण को कवर कर लें जो कह रहे हैं कि आओ माफी माफी खेलें. अरे, इनको नहीं पहचाना, यही तो पंगेबाज हैं. इनसे पंगा नहीं-वरना!!! अब इनसे नहीं तो उनसे भी नहीं…वो तो हमारे खास हैं भाई मसीजिवी– कहते हैं कि सागर अविनाश से नाराज है तो मसीजिवी क्या करे. हम समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इनसे कुछ करने को किसने कहा?? हा हा!!! मगर ई करेंगे जरुर. बहुत खूब, महाराज!!

लोकमंच तो खैर हमेशा से अपनी बात कहता रहा है अलग अंदाज में सो आज भी कह गया कि ये पत्रकार नहीं…चारण भाट हैं, अब इस पर क्या बात करें. मजबूरी है न!! एक ही पर बात करना है.

तो जब एक ही पर बात करना है तो हमारे प्रिय अभय तिवारी का आख्यान सुनें कि मुम्बई की किताबी दुनिया कैसी है या फिर मनीष भाई की नजरों से देखें कि हिन्दी चिट्ठा का वर्तमान और भविष्य कैसा है.

मैं तो उलझ कर रह गया हूँ. अब महावीर जी की बात न करुँ तो यह कैसे हो सकता है जबकि वो बता रहे हैं कि अनिद्रा से विष्णु जी परेशान हैं , क्या हास्य व्यंग्य में बात कही है. वैसे हो तो यह भी नहीं सकता कि दीपक जी जिक्र न किया जाये जो बता रहे हैं कि गर्मी में पंगा, गले से पंगा… अगर आपको समझने में तकलीफ हो तो उन्होंने शीर्षक में ही बता दिया है कि यह व्यंग्य है वरना कहीं आप इसे आप इसे कहानी न मान लें.

अब ऐसा है, जब ठान ही ली है कि एक की बात करेंगे तो क्या सोचना. चाहे रवि रतलामी का बेहतरीन अति लम्ब आलेख ऑटो के पीछे क्या है , जो कि गजब का है, वो छूटे या हर्षवर्धन का कि चीनी विकास का SEZ मॉडल भारत में काम का नहीं , क्या करें. छोड़ तो हम सुनील दीपक जी जैसे उच्च स्तरीय लेखक का आलेख भी दे रहे हैं मानव शरीरों की आमूर्त कला , मगर आप जरुर देखना और इसे भी, जो राजेश भाई ने लिखा है कि क्या चंद्रयान वाकई चाँद पर जायेगा…..इसी बहाने आप पंकज बैगाणी का आलेख भी वही की लिंक से पढ़ लेंगे, यह हुई न एक पंथ दो काज वाली बात. मगर यह सब तो हम छोडे दे रह हैं और हम तो प्रत्यक्षा जी के गन्ने के खेत और गुड निर्माण तक की बात नहीं कर रहे. हम तो नोट पैड की लैंस डाउन
की यात्रा वृतांत
तक नहीं कवर कर रहे..क्या चित्र पर्दशनी लगाई है, मगर हमारी मजबूरी है.

हम तो आज पद्य गद्य का मिलावड़ा- बेजी की प्रस्तुति गांधी के तीन बंदर बस कवर करेंगे और कुछ नहीं. चाहे वो यह ही क्यूँ न हो कि गाँधी बिकाऊ है या जीतू के आलसी लोगों के लिये उपाय ..हमें तो रेडियो सिलोन तक नहीं सुनना .

चलो अब चला जाये, यह एक की तरफदारी करना लफडे का काम है, अपने बस का नहीं..आगे से ऐसा नहीं करेंगे. और ऐसा करने में जो छूट गये हो, वो निश्चिंत रहें, रचना जी, जिन्हें आज चर्चा करनी थी, घूमने निकल गईं, शायद कल आ कर आप लोगों को कवर कर दें. यह मेरी आप लोगों के प्रति हितैशी भावना बोल रही है.जबकि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है..बाकि सब चंगा..आप लोग टिप्पणियां करें वरना बुरा लगता है.

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यह प्रविष्टि उड़न तश्तरी, चिट्ठाचर्चा, समीर लाल, chitha charcha में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

8 Responses to एक चिट्ठे की चर्चा!!!

  1. Pankaj Bengani कहते हैं:

    अरे टेस्ट खेलते खेलते पुरा 20-20 ही खेल लिए हो. :)बढिया, ऐसे प्रयत्न करते रहें, महोदय श्री. बहुत मेहनत…. अब रेस्ट करिए.

  2. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    बापरे! अंतिम चिट्ठे तक आते आते साँसे फुल गई, इतने चिट्ठे!! आपने अच्छा ‘कवर’ किया.

  3. अरुण कहते हैं:

    समीर भाई अब मुझे यकीन ही नही विश्वास हो चला है कि आप अगर मरघट से भी खबर दॊगे तो भी उस गम के माहौल मे हसी ढूढ ही लोगे,आपके लेख और आप (भई फ़ोटो भी साथ ही लगा रहता है)का मै तो कापी राईट लेने के चक्कर मे हू चिन्ता लगी रहती है कही ओटाविया वाले न लेले

  4. बड़ा मेहनत का काम है यह चर्चा करना. और बहुत बढ़िया तरीके से किया है ऊड़न तश्तरी जी ने.

  5. Raviratlami कहते हैं:

    आपने ये मोहल्ला नुमा शीर्षक दे के हमको लुभाया और बुरबक बनाया …ये अच्छी बात नहीं है.

  6. Srijan Shilpi कहते हैं:

    चर्चा करने लायक किसी एक चिट्ठे का चुनाव करते-करते आप ज्यादातर प्रविष्टियों की चर्चा कर ही गए। आपकी यह अदा भी अच्छी लगी। मैं तो कुछ इसी उधेड़बुन में चिट्ठों की समीक्षा वाला क्रम शुरु ही नहीं कर पाया अभी तक। आपने मसिजीवी जी की ताज़ा पोस्ट के संबंध में मेरे मन के जिज्ञासा मिश्रित भाव को जाहिर कर दिया है कि हम समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इनसे कुछ करने को किसने कहा?? हा हा!!! मगर ई करेंगे जरुर. बहुत खूब, महाराज!!मसिजीवी जी की पोस्ट पर नारद के कर्णधारों की प्रतिक्रिया देख लेने के बाद ही मैं इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करूंगा, क्योंकि जवाबदेही उन्हीं की बनती है। समय मिलते ही मैं पूरे प्रकरण का क़ानूनी दृष्टि से विश्लेषण भी करने का प्रयास करूंगा।

  7. विकास कुमार कहते हैं:

    यह एक की चर्चा थी तो अनेक की चर्चा पर तो आप पूरी महाभारत ही लिख डालें.इसे कह्ते हैं ‘कीबोर्ड’ तोड़ कर लिखना. 🙂

  8. रंजु कहते हैं:

    यहाँ आ के सब के बारे में जानकारी मिल गयी …समीर जी आपका लिखा पढ़ना बहुत ही सुखद अनुभव है:)

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