चर्चा के साथ-साथ अब समीक्षा भी

जब पढ़ने को बहुत कुछ हो और समय उस अनुपात में कम उपलब्ध हो तो क्या पढ़ा जाए और क्या छोड़ दिया जाए, यह तय करने के लिए फ्रांसिस बेकन का प्रसिद्ध स्वर्णिम नियम अत्यंत उपयोगी माना जाता है:

Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested; that is, some books are to be read only in parts; others to be read out curiously, and some few to be read wholly, and with diligence and attention.

(कुछ पुस्तकें स्वाद लेने के लिए होती हैं, कुछ निगलने के लिए और बहुत कम ही ऐसी होती हैं जो चबाकर पचाने लायक होती हैं अर्थात् कुछ किताबें आंशिक रूप में ही पढ़े जाने लायक होती हैं, कुछ अन्य उत्सुकतावश पढ़ी जा सकती हैं और बहुत कम ही ऐसी होती हैं जिन्हें समग्रता में परिश्रमपूर्वक और सजग होकर पढ़ना जरूरी होता है।)

यह नियम मुझे नारद पर लगातार अपडेट होते रहने वाली प्रविष्टियों में से पठनीय का चयन करने में बहुत मदद करता है। ऐसा नहीं है कि इस नियम का पालन मैं कोई सचेत भाव से करता हूँ। दरअसल, संपादन के क्षेत्र में कई वर्षों के प्रशिक्षण, अभ्यास और अनुभव से यह एक सहज आदत बन चुकी है। फिर भी, अपने चिट्ठे पर अपनी सुविधा के लिए मैंने पठनीय चिट्ठों की एक सूची बना ली है जिसे समय-समय पर अपडेट करता रहता हूँ। तेजी से बढ़ रही चिट्ठों की संख्या और चिट्ठाकारों द्वारा दिखाई जा रही सराहनीय सक्रियता को देखते हुए पठनीय चिट्ठों का चयन करना जरूरी भी हो गया है। संख्या के साथ-साथ गुणवत्ता की भी फिक़्र करना हमारे लिए बहुत जरूरी है। वरना, कुछ लोग इस नतीजे पर पहुँचते ही रहेंगे कि “अभी हिंदी में कोई बात करने लायक ब्लॉग नहीं है“। भले ही इस नतीजे पर वे अपनी गफ़लत या मुगालते की वजह से पहुँचें।

चिट्ठों की पठनीयता और गुणवत्ता को लेकर अपनी फिक़्रमंदी यदा-कदा मैं चिट्ठा चर्चा के मंच की भूमिका के संदर्भ में जाहिर करता रहा हूँ। चिट्ठा चर्चा का जो स्वरूप रहा है उसमें चिट्ठाकारों को उनके लेखन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने हेतु सहज भाव से प्रेरित कर सकने की गुंजाइश नहीं है। हालांकि चर्चाकारों की टीम में एक से एक प्रतिभावान और अनुभवी चिट्ठाकार शामिल हैं और इसके लिए वे सभी एक नियमित क्रम में प्रतिबद्धतापूर्वक समयदान भी करते हैं। फिर भी, कई चिट्ठाकारों को, जिनमें मैं भी शामिल हूँ, यह महसूस होता रहा है कि इस मंच की भूमिका का और अधिक विस्तार किए जाने की जरूरत है और चिट्ठों की चर्चा के साथ-साथ उनकी समीक्षा का प्रयास भी होना चाहिए। लेकिन जैसी कि कहावत है, पर उपदेश कुशल बहुतेरे – दूसरों को उपदेश देना जितना आसान है, खुद कुछ करके दिखाना उतना ही कठिन। जो दूसरों को सुझाव देने के मामले में आगे रहता है उसे आगे बढ़कर जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए। अनूप शुक्लाजी कई बार चिट्ठा चर्चाकार मंडली में शामिल होने के लिए मुझे कहते भी रहे हैं। लेकिन समयाभाव और दूसरी प्राथमिकताओं के चलते अब तक यह टलता ही रहा था। लेकिन अब मैंने अपने आप को इस भूमिका के लिए तैयार कर लिया है और उनके आमंत्रण को स्वीकार करते हुए इस मंडली में शामिल हो चुका हूँ। मेरे साथ कुछ अन्य चिट्ठाकार साथी भी इस मंडली में शामिल हुए हैं — मसिजीवी और नीलिमा। प्रियंकर जी भी इसमें शीघ्र शामिल होने वाले हैं।

चिट्ठा चर्चा का मूल स्वरूप तो पहले की तरह ही रहने वाला है, लेकिन उसमें एक फीचर अब बढ़ जाएगा। अब उस पर चिट्ठा-प्रविष्टियों की समीक्षा भी हुआ करेगी। प्रियंकरजी कविताओं की समीक्षा किया करेंगे और मैं वैचारिक लेखों की। मेरी इच्छा है कि तकनीकी और हास्य-व्यंग्य की श्रेणियों के लिए भी दो चिट्ठाकार आगे आएँ ताकि हम नारद पर आने वाली सभी तरह की चिट्ठा-प्रविष्टियों को वैचारिक, कविता, तकनीकी और हास्य-व्यंग्य की चार श्रेणियों में बाँटकर उनकी विस्तृत समीक्षा कर सकें। आज तो बस यह भूमिका ही सामने रख रहा हूँ। समीक्षा का नियमित क्रम अगले सप्ताह से शुरू हो जाएगा।

आओ सिंहावलोकन करें

‘पत्र’ और ‘चिट्ठा’ शब्द आपस में लगभग समानार्थी हैं। ‘लगभग’ इस अर्थ में कि एक में तत्सम का अभिजात्य झलकता है तो दूसरे में देशज ठाठ। लेकिन जब ये ‘कार’ से जुड़कर क्रमश: ‘पत्रकार’ तथा ‘चिट्ठाकार’ बनते हैं, तो एक बहुत बड़ी बहस के निमित्त कैसे बन जाते हैं, यह हम पिछले सप्ताह चली हिन्दी चिट्ठाकारों की बहस में देख चुके हैं। यदि हम आज से लगभग पचास वर्ष पहले बालमुकुंद गुप्त (1922-1964) द्वारा लिखित शिवशंभु का चिट्ठा की भाषा, शैली और शिल्प को देखें तो ऐसा लगता है कि आज के हिन्दी चिट्ठाकारों द्वारा लिखे जा रहे चिट्ठे उसी की परंपरा में ही हैं। केवल माध्यम बदल गया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा हिन्दी साहित्य का इतिहास में उद्धृत शिवशंभु का चिट्ठा के एक अंश पर गौर फरमाएँ:

इतने में देखा कि बादल उमड़ रहे हैं। चीलें नीचे उतर रही हैं। तबीयत भुरभुरा उठी। इधर भंग, उधर घटा — बहार में बहार। इतने में वायु का वेग बढ़ा, चीलें अदृश्य हुईं। अँधेरा छाया, बूंदे गिरने लगी। साथ ही तड़तड़ धड़धड़ होने लगी। देखा ओले गिर रहे हैं। ओले थमे, कुछ वर्षा हुई, बूटी तैयार हुई। बमभोला कहकर शर्माजी ने एक लोटा भर चढ़ाई। ठीक उसी समय लालडिग्गी पर बड़े लाट मिंटो ने बंगदेश के भूतपूर्व छोटे लाट उडबर्न की मूर्ति खोली। ठीक एक ही समय कलकत्ते में यह दो आवश्यक काम हुए। भेद इतना ही था कि शिवशंभु शर्मा के बरामदे की छत पर बूँदें गिरतीं और लार्ड मिंटों के सिर या छाते पर।

भंग छानकर महाराजजी ने खटिया पर लंबी तानी और कुछ काल सुषुप्ति के आनंद में निमग्न रहे। हाथ पाँव सुख में, पर विचार के घोड़ों को विश्राम न था। वह ओलों की चोट से बाजुओं को बचाता हुआ परिंदों की तरह इधर उधर उड़ रहा था। गुलाबी नशों में विचारों का तार बंधा था कि बड़े लाट फुरती से अपनी कोठरी में घुस गए होंगे और दूसरे अमीर भी अपने अपने घरों में चले गए होंगे। पर वही चील कहां गई होगी? हाँ, शिवशंभु को इन पक्षियों की चिंता है, पर वह यह नहीं जानता कि इन अभ्रस्पर्शी अट्टालिकाओं से परिपूरित महानगर में सहस्रों अभागे रात बिताने को झोपड़ी भी नहीं रखते।

उपर्युक्त अंश को पढ़ते हुए फुरसतिया, लाईफ इन ए एचओवी लेन, मेरा पन्ना, आईना, बिहारी बाबू कहिन, अज़दक, आदि कई हिन्दी चिट्ठे मेरे जेहन में तैरने लगे। तभी मेरे मन में ख्याल आया कि ‘ब्लॉग’ के लिए ‘चिट्ठा’ शब्द का पहली बार प्रयोग करते हुए आलोक जी के मन में क्या रहा होगा। इसकी पड़ताल के लिए आज बहुत दिनों बाद हिन्दी के पहले चिट्ठे 9-2-11 पर गया, जो 21 अप्रैल, 2003 को अस्तित्व में आया था और वहाँ इतिहास को कुछ इस तरह दर्ज पाया, जब उन्होंने पहली बार इस शब्द का इस्तेमाल किया था:

रविवार, अगस्त 24, 2003


जाल चिट्ठा, यानी वॅब्लॉग? … यह अनुवाद कैसा है? पता नहीं। वैसे मुझे तो सिर्फ़ चिट्ठा ही जम रहा है। तो इस चिट्ठे को आगे बढ़ाएँ।

आलोक जी ब्लॉगस्पॉट के मुफ्त खाते पर बने पहले हिन्दी चिट्ठे को छोड़कर 28 नवम्बर, 2003 को उसी नाम से अपने स्थायी पते पर स्थानांतरित हो गए। जब-जब उनके चिट्ठे पर गया हूँ, कंप्यूटर के लिए हिन्दी के नए-नए औज़ारों की तलाश और उनके प्रयोग को लेकर उनके मन में चलने वाला कौतूहलपूर्ण आह्लाद मुझे हर्ष से भर देता है।

अगले माह 21 अप्रैल, 2007 को हिन्दी चिट्ठाकारी के चार वर्ष पूरे हो जाएंगे। मेरा प्रस्ताव है कि तरुण द्वारा आयोजित किए जा रहे वर्तमान अनुगूँज की अवधि (31 मार्च, 2007) बीत जाने के बाद अगली अनुगूँज चिट्ठाकारी के चार वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित हो। इससे जहाँ पुराने चिट्ठाकारों को अब तक के सफर पर विहंगम दृष्टि डालने का महत्वपूर्ण अवसर मिलेगा, वहीं नए चिट्ठाकारों को चिट्ठाकारी के विकास-क्रम और अब तक की विरासत को समझने का मौका भी मिलेगा।

चिट्ठा चर्चाकारों तथा तमाम चिट्ठाकारों के सुझाव सादर आमंत्रित हैं।

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3 Responses to चर्चा के साथ-साथ अब समीक्षा भी

  1. Kakesh कहते हैं:

    वैसे इतने बढ़े अभियान मैं मेरा कुछ बोलना “छोटा मुंह बड़ी बात” होगा पर तकनीकी चिट्ठों की समीक्षा में ,मैं अपनी सेवायें दे सकता हूं .बाकि जैसा आप उचित समझें.काकेश

  2. गिरिराज जोशी कहते हैं:

    चर्चा मंच पर आपका स्वागत है सिल्पीजी,उम्मीद करता हूँ कि आप नियमित समिक्षा करते रहेंगे।

  3. अविनाश कहते हैं:

    यह काफी सार्थक चर्चा की शुरुआत है। इस तरह की चर्चा हिंदी ब्‍लॉगिंग को एक नया आयाम देगी। हमारी शुभकामनाएं।

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