ब्लॉग पर कौन आये, कौन नहीं?

पिछले दो शुक्रवारों को अवकाश भोगने के पश्चात हम पुन: हाज़िर होते है। हमें अवकाश पर रहना अच्छा लगा, हम भविष्य में भी इस प्रकार अवकाश मनाते रहेंगे… आखिर भाईसा जैसे और भी धांसू चर्चाकारों को इस मंच पर जो लाना है 😉 … भाईसा (सागर चंद नाहर) की चर्चा शानदार रही, हम समय पर टिपिया नहीं पाये और बाद में टिपियाने पर गुरूदेव कहते हैं कि भाई काहे सोये मुर्दों को जगाते हो? अब गुरूदेव ने कहा है तो ठीक ही होगा, अपन मन मारकर टिपियाने से रूक गये। पिछली दो चर्चाएँ नहीं कर पाने की कसर हम आज निकाल देंगे। चर्चा की लम्बाई भले ही फुरसतियाजी की पोस्ट से दो-ढ़ाई इंच कम रह जाये मगर शिकायत का मौका किसी को भी नहीं दिया जायेगा। यह भी कोई बात हुई की चर्चा करें, अपनी रामायण सुनायें और चिट्ठों का मात्र लिंक थमा कर पाठकों को फुसला दें।
गुलज़ार नज़्म लिखते हुए क़लम ही तोड देते हैं, ऐसा मानना है चिट्ठे “कुछ सच्चे मोती” का जिस पर इस बार गुलज़ार साहब की यह खूबसूरत नज़्म प्रकाशित हुई है :

नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होंठों पर
उडते फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुक़म्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी

विनय (V9Y) सूचना लेकर हाज़िर हुए हैं कि RMIM पुरस्कार घोषित हो चुके हैं और ओमकारा को ‘साल का एल्बम’ चुना गया है साथ ही वें सभी वोटरों और सहयोगियों को धन्यवाद भी अदा कर रहें है, ले लिजियेगा 🙂

ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल आप सब के लिये कितनी उपयोगी है यह आप उनके चिट्ठे पर जाकर देखियेगा। उनका नौजवानों को गलती करने से रोकने का अंदाज भी खूब रहा, शुरूआत व्यंग्यात्मक हास्य से करने के पश्चात वे यकायक सिरियस मुद्रा में आ गये –

मैं धन के प्रति गलत अवधारणा को एक गम्भीर गलती मानता हूं. यह कहा जाता है कि आज का युवा पहले की बजाय ज्यादा रियलिस्टिक है. पर मैने अपने रेल के जवान कर्मचारियों से बात की है. अधिकांश को तो इनवेस्टमेंट का कोई खाका ही नहीं मालूम. ज्यादातर तो प्राविडेण्ट फण्ड में पैसा कटाना और जीवन बीमा की पालिसी लेने को ही इनवेस्टमेंट मानते हैं. बहुत से तो म्यूचुअल फण्ड और बॉण्ड में कोई अन्तर नहीं जानते. स्टाक की कोई अवधारणा है ही नहीं. मैं जब पश्चिम रेलवे के जोनल ट्रेनिंग सेण्टर का प्रधानाचार्य था तो नये भर्ती हुये स्टेशनमास्टरों/गार्डों/ट्रेन ड्राइवरों को पैसे का निवेश सिखाने की सोचता था. पर उस पद पर ज्यादा दिन नहीं रहा कि अपनी सोच को यथार्थ में बदलता.

ज्ञानदत्तजी ज्ञान की बातें कर ही रहे थे कि चौधरी चाचू आ धमके, बोले, “हम भी कुछ शानदार जुगाड़ लाया हूँ, बहुत काम के है”। हमनें समझाया कि तनिक रूकिये भाई, हम आ रहें आपके पास, पहले कुछ नये-नवेलें चिट्ठों में झांक लेता हूँ तो यकायक भड़क उठे, “तो क्या यह जुगाड़ मैं अपने लिये इक्कट्ठे करता हूँ, तुम समझते काहे नहीं हो भाई, यह नये लोगन के लिए ही है, ज्यादा ना नुकर की तो…”। हम तुरंत नत-मस्तक हो लिये उनके समक्ष, तो भय्या बीच में जुगाड़ घुसाने की मेरी मजबूरी आप समझ रहें हैं ना? तो यह लिजिये जुगाड़, खासकर संगीत-प्रेमियों, निवेशको और वायरस से परेशान पाठकों के लिये, चौधरी चाचू द्वारा सप्रेम भेंट के रूप में।

मैथिली गुप्त जी अपने हिन्दीगियर में तकनीकी ज्ञान का पिटारा खोल दिया है, स्केलबल वेक्टर ग्राफिक्स एडिटींग के लिये इंकस्केप नामक सॉफ्टवेयर के बारें में जानकारी दे रहे हैं जो विंडो और लिनक्स दोनों पर चलता है, हालांकि उनके कम्प्यूटर पर यह कुछ धीमा चल रहा है मगर फिर भी वे चाहते हैं कि आप भी प्रयोग करके देखें।

हिन्द-युग्म पर खुशियाँ मनाई जा रही है। २ अक्टूबर, १९६५ को रायपुर में जन्में हिन्दी और छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्रति समर्पित तथा सृजनगाथा के प्रधान सम्पादक श्री जयप्रकाश मानस १० अप्रैल २००७ से हिन्द-युग्म के यूनिमीमांसक की भूमिका निभायेंगे। निश्चय ही मानसजी जैसे सृजनात्मक कवि का हिन्द-युग्म से जुड़ना हिन्द-युग्म के भविष्य के लिए अच्छे संकेत है, उनके आगमन की सूचना देते हुए लिखी पोस्ट में शैलेशजी मानसजी के संक्षिप्त परिचय के साथ बता रहे हैं कि उनके आगमन से हिन्द-युग्म को किस प्रकार काव्यबल मिलेगा –

कई पुरस्कारों से सम्मानित कवि, ललित निबंधकार श्री जयप्रकाश मानस हिन्द-युग्म पर प्रतिमाह प्रकाशित कविताओं की समीक्षा करने के लिए तैयार हुये हैं। इस वरिष्ठ साहित्यकार की काव्य-विवेचना से हिन्द-युग्म के कवियों को काव्यबल भी मिलेगा और दिशानिर्देश भी। कौन कवि या लेखक नहीं चाहता कि उसकी रचनाओं की मीमांसा मानस जैसा साहित्यकार करे!

काकेशजी (?) नैनीताल समाचार के नये अंक में छ्पी श्री मुकेश नौटियाल की कविता सुना रहे हैं। नर-नारी में भेद की करूण व्यथा को बहुत ही खूबसूरत कविता में पिरोया गया है, आप अवश्य पढ़ियेगा –

जब पढ़ोगी तुम इस कविता को
तो हंसोगी शायद
कि उत्तर आधुनिकता के ठीक पहले तक
अपने यहां की महिला डाक्टर
माफी माँगा करती थी बेटियाँ होने पर
और मेरे जैसे बाप
हारे हुए सिपाही समझे जाते थे
तुम्हारे होने पर…..

अज़दक पर प्रमोद भाई ने एक अच्छा मुद्दा उठाया है, ब्लॉग-जगत में लगातार बढ़ रही दूरियों को आपसी वार्तालाप से ही समाप्त किया जा सकता है , मैं क्षमा चाहूँगा कि यदि आप बोरियत महसूस कर रहें हो तो मगर इस पोस्ट की खुलकर चर्चा करने से मैं स्वयं को नहीं रोक पाऊँगा, हो सकता है कि इसके चक्कर में मेरी इस चर्चा की लम्बाई फुरसतिया की पोस्ट के समतुल्य हो जाये मगर यह आवश्यक है। ब्लॉग पर कौन आये, कौन नहीं के प्रश्न का हल खोजते हुए वे कहते हैं कि –

चिट्ठाकारी और ब्‍लॉगिंग क्‍या है. ऑन लाईन डायरी गुलज़ार की किताब को पा लेने के सुख, पास्‍ता का वर्णण और लिट्टी-चोखा का आस्‍वाद, अपनी कविताओं को सजा-छपा देखने की खुशी, किसी देखी गई फिल्‍म और उतारे गए फोटो पर हमारी-आपकी राय, मन की उधेड़-बुन और यार-दोस्‍तों की गपास्‍टक, इंटरनेट व हिंदी ब्‍लॉगिंग की तकनीक व नई जानकारियों को जानने-बांटने का उल्‍लास- के दायरों में ही रहे ऐसा हम क्‍यों चाहते हैं? क्‍या यह कक्षा में किसी नये छात्र के चले आने पर पैदा हुई बेचैनी है जिसका व्‍यवहार, रंग-ढंग ठीक-ठीक वैसा ही नहीं है जैसा सामुदायिक तौर पर हम देखते रहे थे? अपने बारे में आपकी राय मैं नहीं जानता मगर समुदाय में रवीश कुमार और अनामदास को पाकर आप प्रसन्‍न नहीं हैं? भाषा और विचारों की प्रस्‍तुति का उनका अंदाज़ आपको लुभावना नहीं लगता? ये दोनों पत्रकार हैं, मैं नहीं हूं, लेकिन दोनों के ही पोस्‍ट बड़े चाव से पढ़ता हूं, जबकि अनामदास की चिंतायें बहुत मेरे मिजाज़ के अनुकूल भी नहीं हैं. फिर भी. क्‍योंकि उनको पढ़ने में एक विशेष रस मिलता है.

आप फिर मुझे बड़बोला और सर्वज्ञानी की गाली देकर धिक्‍कारेंगे, दीजिये. वह ज्‍यादा अच्‍छा और स्‍वास्थ्‍यकर है बनिस्‍बत किसी फारुकी या नीलेश मिश्र के लिखे पर बम-गोला होने लगने के. भई, पत्रकार समीक्षा करेगा तो ज़ाहिर है अपनी बिरादरी को पहले याद करेगा. आप किसी तकनीकी फॉरम में चर्चा करेंगे तो तकनीकी बिरादरी के कामों की तारीफ करेंगे,
रवीश की लिखाई को याद करना शायद तब आपको याद न आए. इसमें ताजुब्‍ब और तकलीफ क्‍यों है? अंतत: तो आप भी मान ही रहे हैं अच्‍छे और सार्थक पोस्‍ट्स ही अपनी तरफ ट्रैफिक खींचेंगे, कोरा सेंशेनलिज्‍म नहीं. मेरी जानकारी इस विषय में कम है मगर हिंदी के अच्‍छे और बुरे ट्रैफिक में भी अभी फ़र्क कितना है? चार सौ? पांच सौ? सिलेमा वाले मेरे ब्‍लॉग पर औसतन पचास लोगों की आवाजाही होती है, कभी-कभी और भी कम. अभय अच्‍छा लिखते हैं मगर वह भी पचास पाठक पाकर सुखी हो लेते हैं. तो उसके लिए अभय और मैं पत्रकारों को तो दोष नहीं दे सकते. ढाई सौ की बिरादरी में जिनकी संख्‍या पंद्रह से ज्‍यादा तो कतई नहीं ही होगी, और उसमें भी हल्‍ला करनेवाला अकेला अविनाश है.

फिर आने वाले समय में चिट्ठाजगत में बाज़ारवाद के हावी होने की शंका उठाते हुए वे कहते हैं कि –

गंध तो आनेवाले दिनों में मचेगा. जैसे-जैसे सुलभता बढ़ेगी, नये खिलाड़ी आयेंगे. बाज़ार के विचार, सेक्‍स और सामान बेचनेवाले.

ब्‍लॉग में बात कम विज्ञापन ज्‍यादा होगा. हमारे गरीब टेप्‍लेट से ज्‍यादा चमकदार, ज्‍यादा प्रभावी होगा. वीडियो क्लिपिंग्‍स दिखाएगा, हिट गाने सुनाएगा. उनके ट्रैफिक के आगे हम कहीं नहीं टिकेंगे. फिर? तब क्‍या करेगा नारद? शायद तब तक नारद का और विस्‍तार हो, ज्‍यादा साधन-संपन्‍न बने, मगर जो बीस तरह की नई आवाज़ें होंगी और जिनके पास बाज़ार की ताकत और ज्‍यादा साधन-संपन्‍नता होगी वो चुप तो नहीं ही बैठेंगे. लुभावने ठाट-बाट के आकर्षण से लैस नए पोर्टल खोलेंगे. ट्रैफिक की नाटकीयता से हमें चकाचौंध कर देंगे. तब?

इस पोस्ट पर देबूदा और जीतु भाई द्वारा दी गई टिप्पणियों का जिक्र भी यहाँ करना आवश्यक प्रतित हो रहा है, हालांकि मैं जानता हूँ कि मुझे केवल ताजा प्रविष्टियों की चर्चा ही करनी चाहिये मगर इन टिप्पणियों का भी यहाँ जिक्र करना आवश्यक प्रतित हो रहा है। देबूदा पूर्वाग्रह को छोड़कर वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार अपनी राय तय करने में दिलचस्पी देते दिखे और अविनाशजी ने भी उनका समर्थन किया –

अविनाश आप ये तो मानेंगे कि पूर्वाग्रह दोनों तरफ ही रहे हैं। आपके हाल ही के स्पष्टिकरण जिसमें आपने मौज में लिखा कि चिट्ठाकारी से आप लोगों की नौकरी ही खतरे में है ने मुझे अपनी राय थोड़ा बदलने का मौका दिया। एहसास हुआ कि शायद मेरा कयास
वाकई पूर्वाग्रह ही रहा हो।

अब मैं आपसे कहूँ कि कुछ पूर्वाग्रह आप भी छोड़ें। “सामंती अनुशासन की नकेल” की बात आप केवल एक साईट के विषय में कह रहे हैं वो है नारद। नारद एक जालस्थल है, मुहल्ला की ही तरह, जैसे आप ये निर्णय लेते हैं की पूर्व प्रकाशित रचना स्वीकार नहीं करेंगे वैसे ही नारद के संचालक ये निर्णय लेते हैं की फलां फलां किस्म के ब्लॉग शामिल नहीं करेंगे। अगर आप अपना निर्णय सही मानते हैं तो नारद का भी मानें और ये निर्णय लेने की उनके हक को सम्मान दें। क्या मेरे द्वारा प्रेषित पैरिस हिल्टन की अधनंगी तस्वीर आप अपने चिट्ठे पर छापना चाहेंगे? आप कहेंगे ये मेरा निर्णय होगा, बिल्कुल! जिसकी साईट उसका निर्णय, इसको पूरी बिरादरी पर न थोपें।

अब जीतु भाई की टिप्पणी के कुछ अंश –

देखो भाई, ब्लॉग एक अलग तरह का माध्यम है। हमारी पहुँच, आकांक्षाए और सपने बहुत सीमित है। हम जहाँ भी है, वहाँ काफी खुश है। आज नही तो कल, हमारे प्रयासो को दुनिया देखेगी। हम इन्टरनैट पर हिन्दी ब्लॉगिंग को बढते हुए देखना चाहते है, लेकिन साथ ही प्रदूषण भी नही चाहते, ना ही गुटबाजी, राजनीति और किसी तरह का कलह।

ये सच है कि अभी तो शुरुवात है, कई तरह के लोग आएंगे। अभी तो दस परसेन्ट भी नही आए, तब शायद नारद को भी अपस्केल करना पड़े, या ऐसे कई नारदों की जरुरत रहे। लेकिन तब भी, हम अपने नारद को साफ़ सुथरा ही रखना चाहेंगे। आपके लिए नारद शायद एक माध्यम होगा, लेकिन हमारी भावनाएं जुड़ी है नारद से।

जिस तरह मोहल्ला वाले स्वतन्त्र है अपने मोहल्ले को साफ़ रखने मे, उसी तरह नारद के संचालक भी स्वतन्त्र है,नारद को स्वच्छ रखने में। हमने एक आम सहमति बनाने की कोशिश की थी, इस दिशा मे, लेकिन वो शायद नही पाई, लोगों ने उसे अलग तरीके से लिया, खैर। आपने यदि ब्लॉगिंग शुरु की थी तो नारद के भरोसे नही की थी, ना ही हमने कभी मीडिया की जरुरत महसूस की थी। नारद से शायद आपको कुछ ट्रैफ़िक मिलता होगा और हमे एक सुख, कि एक और भाई हमारे गाँव मे शामिल हुआ। लेकिन यदि किसी ब्लॉग विशेष से गाँव की शांति भंग होती है तो व्यवस्था देखने की जिम्मेदारी भी गाँव वालों की ही है। या तो आप साल छह महीने टिको, हमारे साथ घुलो मिलो, हमारा ही एक हिस्सा बनो, तब शायद हमे शंकाए ना रहे, लेकिन यदि आप आते आते ही हवा बदलने की कोशिश करोगे, तो हम भी सोचने पर मजबूर हो जाएं कि आप लोग किसी एजेन्डे के साथ आए हो।नए मीडिया चिट्ठाकारों ने जिस तरह अपने ब्लॉग का प्रचार करके, बाकी को दरकिनार किया, उससे इन शंकाओं को बल मिलता है। आप कहेंगे कि कुछ पत्रकारों ने ऐसा किया, तो मै पूछता हूँ, आपने प्रतिकार क्यों नही किया? आपने उनसे सवाल जवाब क्यों नही किये?

जोगलिखी पर संजय भाई एक आंग्ल भाषा का पत्र पढ़वा रहें है, पढ़वाने से पूर्व ही सबको चेता भी रहें है कि इसमें प्रयुक्त सभी शब्द गलत हैं मगर मुझे ताज्जुब हुआ जब मेरे जैसा आंग्ल भाषा का अल्पज्ञानी भी उसे एक सांस में पढ़ गया, ये रिसर्च वाकयी कमाल का है, मगर देवनागरी भाषा को भी इस प्रकार पढ़ा जा सकता है?, जी हाँ, पढ़ा जा सकता है। यकिं नहीं होता? यह देखिये दीप्ति पंत जी ने अपनी पोस्ट जीवन एक सफ़र में इसी प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया है और मुझे तो पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं हुई –

जीवन कित्ना गह्ररा और कितना द्वन्द भरा है , पता नहि चल्ता..
लग्ता है आज हि
तोह मै एक लद्कि थि और आज मेरि बेति ब्यअह के कअबिल है.

मेरा मन बहूत हि
उच् श्रिंकहल है, पर विचआर उत्ने हि गह्रेरे है….
खेल्ते है मन से ,
उस्को इधर उगधर ले जाते है…
खेल मन का , विचरो से

जैसे पत्तो के
बीच से बह्ति है हवा…
जैसे एक उर्ज जो छोध् जाति एक रोश्नि , रस्ता खालि खाली
सा….
अपनि पएह्चन् खोज्ने निक्ले हम,

जाने कहा पहूचेंगे , और कब

कउछ पता नहि….

बेजीजी ने कल सवाल खड़ा किया था कि पत्रकार ब्लॉगर क्यों बने? उसके जवाब में आज प्रमोद सिंह के साथ-साथ अभय तिवारी नें भी अपनी राय जाहिर की। लगता है यह बहस अभी और लम्बी चलेगी। पत्रकारों की प्रतिक्रियाएँ आना अभी बाकि है तो उच्च क्षमतावान समझे जाने वाले चिट्ठाकार भी अभी शाँत है… खेर हमारी नज़र बनी रहेगी J

मानसीजी ने चंपक में छपी एक कविता में बदलाव कर एक नईं बाल कविता का निर्माण किया है… अफ़लातूनजी के प्रयास शैशव के बाद मुझे यह दूसरा चिट्ठा नज़र आया जिसमें बालमन के लिये एक प्रयास हुआ। भविष्य में बच्चे/किशोर भी हिन्दी चिट्ठाकारिता में उतरकर 56 इंच (लगभग) का घेरा साथ में लेकर उड़ने वाली तस्तरी को भी अपनी ओर खींच पानें समक्ष होंगे, ऐसी आशा है।

दिल का दर्पण में जाते ही पहले तो हम घबरा गये कि यह बड़े-बड़े अक्षरों में क्या लिखा आ रहा है? फिर ध्यान से देखा तो हमारा अतिथि क्रमांक था, इसके लिए मोहिन्दरजी का आभार। हमें हमारा अतिथि क्रमांक देने के बाद उन्होंने एक बहुत ही सुन्दर कविता “भौर का निमंत्रण” प्रस्तुत की –

भौर देती है निमन्त्रण
नव किरणों का
सोपान कर ले
रात्री के सुनहले
स्वपनों से निकल कर
आने वाले पलों का

एक और दिल के करीब कही जा सकने वाली पोस्ट रही विशाल सिंह जी के चिट्ठे अनहद पर, नंदीग्राम में हुए ताजा नरसंहार पर उनकी कलम इतिहास से वर्तमान तक हर पहलू को छूती है –

समाजवाद के महान आदर्श नारों तक ही क्यों रह जाते हैं। कुछ लोगों की स्वार्थपरकता समष्टि के हित पर भारी क्यों पड जाती है? स्टालिन के रूस और साम्यवाद के नाम पर अन्यत्र होने वाले अत्याचार यही बताते हैं कि का मनुष्य द्वारा शोषणा किसी व्यवस्था विशेष के फल नहीं हैं अपितु शोषण का ये क्रम तब तक चलता रहेगा जब तक मनुष्यमात्र में मनुष्यता के प्रतिआदर और आदर्शों के प्रतिनिष्ठा नहीं पैदा होती। अगर ब्रिटेन और अमेरिका में औद्योगिक क्रंति के दौरां श्रमिकों के साथ अन्याय हुआ, तो स्टालिं के रूस और छद्मसाम्यवादी चीन के हाथ भी ख़ून से रंगे हुए हैं जार्ज ओर्वेल की यह कहानी स्वार्थसिद्धि के लिये व्यवस्था के दुरुपयोग का शास्त्रिय वर्णन है । जार्ज ओर्वेल ने यह कहानी सोवियत रूस में स्टालिन से प्रभावित होकर लिखी थी, लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में भी यह उतनी ही सही लगाती है। कहानी शुरु होती है, पशुओं के एक फ़ार्म से जिसके पशु अपने मालिक से इसलिये परेशान रहते हैं कि वो उनसे काम ज्यादा लेता है, लेकिन अपेक्षित बर्ताव नहीं करता है। पशुओं कि सभा होती है जिसका नेतृत्व ओल्ड मेजर(कार्ल मार्क्स से प्रेरित चरित्र) नाम का सुअर करता है, सभा में वह पशुओं को अपने सपने के बारे में बताता है कि एक दिन फर्म से मनुष्य चले जायेंगे और पशु शांति और समरसता से रहेंगे. तीन दिनों बाद ओल्ड मेजर मर जाता है तो स्नोबाल और नेपोलियन नाम के दो सूअर विद्रोह का निश्चय करते हैं. पशुओं में सबसे वृद्ध एक गधा कहता है कि उसने बहुत जिंदगी देखी है और वो जानता है कि अंततः कुछ नहीं बदलेगा, जवान पशु समझते हैं कि गधे के बुढे खून में क्रांति की कमी है और उसा पर ध्याना नहिं देते हैं। सारे पशु इस आशा से लडते हैं कि विद्रोह के बाद साम्यवाद आयेगा, सबको स्वधीनता और समता प्राप्त होगी। नियत समय पर युद्ध शुरु होता है, कुछ पशु शहीद होते हैं, कमांडर सहित कुछ को गोली लगती है लेकिन अंततः मालिक मारा जाता है और फ़ार्मा स्वतंत्र होता है। फ़ार्म का नाम “एनिमल फार्म ” रखा जाता है।सारे पशु खुशियां मनाते हैं, भविष्य के लिये सात दिशानिर्देश तय होते हैं, जिनको फ़ार्म के बीचोबीच एक तख्ते पर लिखा जाता है।

सभी दोपाये शत्रु हैं।
सभी चौपाये मित्र हैं।
कोई पशु वस्त्र नहीं पहनेगा।
कोई पशु पलंग पर नहीं सोयेगा।
कोई पशु शराब नहीं पियेगा।
कोई पशु दुसरे पशु की हत्या नहीं करेगा।
सभी पशु समान हैं।

ज्ञानदत्त जी एक और अच्छी ख़बर लेकर आये हैं जिस पर प्रत्येक हिन्दुस्तानी को गर्व होगा। बीबीसी वल्ड सर्विस और ग्लोब-स्कान के २७ देशों मे २८००० लोगों से किये सर्वेक्षण में निकला है कि भारत ही एकमात्र देश है जिसने पिछले वर्ष में अपना कद व्यापक तौर पर बेहतर किया है. भारत की स्थिति में महत्वपूर्ण सुधार है. बस ही सुधार वर्ल्ड-कप में भी हो जाये तो क्या कहने 🙂 । खालीपीली जी (आशीष श्रीवास्तव) 23 वीं अनुगूँज के लिए अपनी पोस्ट “अनुगूँज 23: ऑस्कर, हिन्दी और बॉलीवुड” लेकर हाज़िर हुए हैं। भारतिय सिनेमा को इतिहास से लेकर वर्तमान तक अपनी नज़रों से देखने का प्रयास किया है जिस आपको टिप्पणी केवल संयत भाषा में देने की इजाजत है। जागरण डोट कॉम में छपी एक ख़बर का हवाला देते हुए कमल शर्माजी बता रहें है कि सास-बहू के झगड़े का कोर्ट में क्या हुआ? तो अफ़लातूनजी झगड़ों से दूरी बनाते हुए अपनी “कम्युनिस्ट देश और उपभोक्तावाद” श्रृंख्ला का अंतिम भाग लेकर उपस्थित हुए। दिल्ली निवासी डॉ. शर्मा को रिस्तों का एहसास हो रहा है, जिसे उन्होंने सबके समक्ष कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया है –

एक थोड़ी सी आशा बंधी
सरल सीधा सादा
दुनियादारी की चालाकियों से बेखबर
अपने मन में कुछ धीरजधर –
फिर –
साथ के पांव की ओर बड़े विश्‍वास से
ताका –
कहा –
यार, मेरे दोस्‍त,
कुछ मदद कर
मुझे इस संकट से मुक्‍त
कर
दूसरे पांव ने देखा – सुना
अनजान सा होकर मुंह फेर लिया

क्या आप रिस्तों से बाहर निकलकर जानना चाहेंगे कि टी.वी. की सात सबसे बड़ी ख़बरें कौनसी हैं? इसके लिये आपको सीएमएस मीडिया लैब जाना होगा, मगर हाँ सबसे बड़ी ख़बर क्रिकेट वर्ल्ड-कप ही है, आखिर पैसा भी तो इसी से मिल रहा है अभी 🙂 । सिलेमा में देखिये एक रिपोर्ट फिल्म “हनीमून ट्रैवेल्‍स प्रा. लि.” के बारे में। कमल शर्मा जी सास-बहू की ख़बर देने के पश्चात सर्वे-रिपोर्ट पर कलम चला रहे हैं। देश में गरीब कम हो गए और अमीर ज्‍यादा। मगर कैसे? इसका जवाब वे सरकार से मांग रहें है। कहीं इसके पिछे यह नारा “गरीबों को हटा दो…गरीबी अपने आप हट जाएगी” तो नहीं?

मोहल्ले में अनीश अंकुर, योगेंद्र यादव जी का साक्षात्कार लेकर घुमते दिखे तो मनिषाजी अपनी चिट्ठी लेकर हाज़िर हो गई और अविनाशजी ने तुरंत मौका देखकर बहस समाप्ती की घोषणा कर दी। मुम्बई-ब्लॉग्स में नंदीग्राम-कांड पर लोकमंच के राजनीतिक संपादक राम लाल खन्ना जी के विचारों का प्रथम भाग पढ़ने को मिला। रचनाकार के अगले अंक में असग़र वजाहत का यात्रा संस्मरण : चलते तो अच्छा था की पहली किश्त – ‘मिट्टी का प्याला’ पढ़ने को मिलेगी, ऐसा वादा किया जा रहा है। संभवतया हितोपदेश आज की सबसे लम्बी पोस्ट रही, संस्कृत और उसका हिन्दी अनुवाद के साथ-साथ प्रवाह युक्त कहानी भी बहुत शानदार रही। देवेश वशिष्ठ ‘खबरी’ एक खूबसूरत कविता उदासीनता का आँचल प्रस्तुत कर रहे हैं –

दूर-दूर तक उडती धूल,
चेहरा मेरा खिला कहाँ है?
कहाँ खिले दिल में दो शूल?
बतलाओगे कैसा सूखा ?
कैसी होती है कलकल ?
मैंने कब का ओढ लिया है
उदासीनता का आँचल।

घुघूती बासूती जी कविता के माध्यम से यादों में खोती नज़र आई –

ये ही तो वे हैं जो ला डाल देती
गोद प्यारी नन्ही बिटिया को
ये ही तो लौटा लाती हैं फिर से
मेरे और उसके बीते बचपन को ।

कुछ सिमटी सी कुछ लिपटी सी
यादें ही तो विरहा के गीतों में हैं
कुछ खट्टी किन्तु कुछ मीठी सी
ये तो प्रिय की हर धड़कन में हैं ।

शुभ्रा गुप्ता (?) की कविता पिता पुत्र संवाद भी बहुत खूबसूरत है, एक नज़र इस पर भी मार लिजियेगा –

पिता से गर कहना हो कुछ तो बेझिझक कह ओ नादान
लेकिन वाणी और मर्यादा का रहे हमेशा ध्यान
दोस्त नहीं हूँ तेरा जो तेरे स्तर पर उतर आऊँगा
तेरा हाथ अपने काँधे पर नहीं, हाथ तेरा अपने हाथों में थामूगाँ
नई पीढ़ी ने इस पावन रिश्ते को दी है एक गलत पहचान
हर रिश्ते की होती है अपनी ही एक मर्यादा और मान
यह रहे हमेशा ध्यान पिता के पद का होता है एक विशिष्ट सम्मान
इसीलिये अपनी मर्यादा का रहे तुम्हें भी ज्ञान
ताकि तू भी बता सके अपने पुत्र को इस रिश्ते की सही पहचान

चर्चा काफि लम्बी हो चली है इस कारण मैने आगे का प्रभार सागर भाईसा के कंधो पर डालकर खिसकने का मन बनाया ही था, इतने में गुरूदेव टहलते-टहलते आये (अब इतने भारी-भरकम शरीर से टहलना ही हो सकता है) और बोले, “बिना महाराज समीरानन्द के कोई कार्य कैसे पुरा हो सकता है, मेरी पोस्ट की भी चर्चा करों”। हमने निवेदन किया कि गुरूदेव आपने कुछ लिखा ही नहीं तो चर्चा कैसे करूँ, आप कुछ लिखें। मेरी मजबूरी को वे तुरंत भांप गये और फटाफट एक मेल उठाकर पोस्ट कर दिया। मुझे लिंक देकर बोले, “लो अब करो चर्चा”। गुरूदेव से हालांकि अच्छी पोस्ट की उम्मीद रहती है मगर पिछले कुछ समय से वे लय में नहीं दिख रहे, खेर उनका लेखन तो उम्दा है ही। वे ‘खेद हैं’ लिखते हैं तो भी हँसी फूट पड़ती है। खेर गुरूदेव के इस मेल रूपांतरण पोस्ट में लिखे आँकड़े पुन: अपने आप को दोहराएँ और भारत एक बार फिर से वर्ल्ड-कप जीत कर लौटे इसी शुभकामना के साथ मैं इस चर्चा को यहीं समाप्त करता हूँ।

आज की तस्वीर : हमारा संसार से साभार

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attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि गिरिराज जोशी "कविराज", चिट्ठाचर्चा, chithha charcha, Giriraj Joshi "Kaviraj" में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

5 Responses to ब्लॉग पर कौन आये, कौन नहीं?

  1. यद्यपि आप विश्राम पर थे, परंतु इससे कार्य करने के लिए आपके पास बहुत ऊर्जा एकत्रित हो गई है। बधाई हो!!!

  2. उन्मुक्त कहते हैं:

    जोशी जीमैं लिनेक्स में फायरफॉक्स पर अंतरजाल देखता हूं। इस पर आपकी चर्चा फैली हुई और पढ़ने में नहीं आ रही है। क्या आपने इसे Justify कर प्रकाशित किया है? यदि हां तो कृपया इसे Left Align कर प्रकाशित करें ताकि हम भी इसका रसास्वादन कर सकें। अन्यथा मेरे जैसे लोग तो वंचित ही रह जायेंगे।मेरा यह सुझाव सारे चिट्ठेकार बन्धु और बहना से भी है।

  3. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    खुब लम्बी चर्चा रही. अच्छा प्रयास.लगे रहो. 🙂

  4. अनूप शुक्ला कहते हैं:

    बढ़िया चर्चा की। बहुत अच्छे। बधाई!

  5. Udan Tashtari कहते हैं:

    वाह!! बहुत खूब…लिखते रहो और भी लम्बी लम्बी चर्चायें…बधाई!!

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