मध्यान्हचर्चा दिनांक : 19-03-2007

(आप सभी को भारतीय नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाऐं)

संजय कक्ष में प्रवेशते देख धृतराष्ट्र ने व्यंग्य किया,” आओ, संजय. नियमितता कोई तुमसे सीखे. संजय ने आँखें चुराते हुए लैपटॉप पर नजरे गड़ा दी.

घृतराष्ट्र : यहाँ वहाँ के टंटो में टाँग डालना बन्द क्यों नहीं कर देते? समय की बचत होगी तथा चर्चा सुनाने का समय भी निकलेगा. कुछ सलीके की एक-आध प्रविष्टी भी लिख सकोगे. खैर अभी तो चिट्ठा दंगल का हाल सुनाओ.
संजय : जी महाराज. प्रथम तो महाशक्ति द्वारा भारतीय नववर्ष की बधाई स्वीकारें.
साथ ही कानपुर में जन्मे बॉब वुल्मर जो क्रिकेट के आधुनिक कोच थे, उन्हे पंकज के साथ श्रद्धांजलि दें.
लाइन में खड़े काकेश चिट्ठाकारी की आचार संहिता से असहज है तथा ‘मैं या हम’ जैसी भाषा को लेकर भ्रमित दिख रहे है.
वहीं समीरलालजी को कोई भ्रम नहीं की दो भाईयों को जोड़ने वाला सेतु माँ होती है.
मगर अच्छे अच्छो को भ्रम में डाल देने वाले भाषा-इंडिया की भाषा की पोल खोल रहे है, रवि रतलामी.

घृतराष्ट्र : धन्य है ये भाषा इंडिया को चलाने वाले.
संजय : तथा धन्य है भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी. शर्मनाक हार के बारे में गिरीश सिहं की बात माने तो इसका करण है देश के खिलाड़ीयो का खेल के बजाए धन कमाने पर अधिक ध्यान एवं प्रसिद्धि बटोरने के फेर में पड़ जाना.

घृतराष्ट्र : जीत के लिए चाहिए कड़ा परिश्रम व जीतने की अदम्य इच्छा.
संजय : ऐसे ही मानव के परिश्रम व इच्छा शक्ति का परिणाम है वायेजर २ जो सबसे ज्यादा सुचनाएं प्राप्त करने वाला शोध यान है.
वैसे बीना परिश्रम के पुण्य कमाया जा सकता है, कैसे? नहा कर. बता रहे है, कस्बा निवासी रविश.
अब महाराज आप मानसी जी से ‘नेमसेक’ फिल्म की समीक्षा सुने तथा जुगाड़ का आनन्द ले. मैं होता हूँ लोग-आउट.

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यह प्रविष्टि मध्यान्हचर्चा, संजय बेंगाणी, sanjay bengani में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

2 Responses to मध्यान्हचर्चा दिनांक : 19-03-2007

  1. Udan Tashtari कहते हैं:

    सच कहते हैं कि नियमितता तो कोई आपसे सीखे. :)कल पक्का आना फिर से…अब रोज निवेदन कर लिया करेंगे कि भईया, कल फिर आना!! 🙂

  2. Rakesh Khandelwal कहते हैं:

    समीरजी के अनुमोदन मेंकल फिर आना मित्र, तुम्हारी राह तकेंगेंऔर लिखोगे तुम जो वो दस बार पढ़ेंगेंतुम धीमे से चिट्ठों की सांकल खड़कानाफिर हौले से अपना माऊस इधर घुमानापाओगे चिट्ठों को अपनी राह देखतेचर्चाके सोनहले सपने यार देखतेशायर होंगे खुद को कई बताने वालेऔर चन्द होंगें जनता के ठेके वालेकोई लेकर खड़ा शिकायत होगा पथ मेंऔर समीक्षा होंगे कुछ लिखवाने वालेबिना किये परवाह, कुंजियों को खटकानाजिसकी चाहो, बस उसकी चर्चा कर जानादेश-काल के बन्धन कुछ तो छूटेंगे हीउसकी चिन्ता किये बिना बस लिखते जानाशब्द शब्द जो टंकित हो स्वीकार करेंगेऔर लिखोगे जो तुम वो दस बार पढ़ेंगें

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