दीवाने हो भटक रहे हो मस्जिद मे बु्तखानों में

एक बड़ा उमदा शेर पढ़ता था, अब यह भी याद नहीं किसका है, मगर जिसका भी है, उनको साधुवाद कि मौके पर याद आये. आप भी सुनें:


लहरों को शांत देखकर यह मत समझना,
कि समंदर में रवानी नहीं है,
जब भी उठेंगे तूफान बन कर उठेंगे,
अभी उठने की ठानी नहीं है.

लेकिन आज उठ ही गये. जब प्रत्यक्षा जी ने अपने इरफान से मिलवाया था, तभी फुरसतिया जी कह आये आये थे कि अब हमें भी लिखना पड़ेगा और उठे आज. आये तो ऐसा आये कि आते ही चले गये और लिखते ही चले गये, वही बेहतरीन अंदाज, वही बहाव और वही लम्बाई :).

लेख दीवाने हो भटक रहे हो मस्जिद मे बु्तखानों में आधी चिट्ठा चर्चा भी कर गये: यह देखें:

ये भैये हमारे मोहल्ले वाले अविनाश जो न करायें!
पहले बोले आओ इरफ़ान-इरफ़ान खेलें। फिर जब लोग खेलना शुरू किये तो बोले ऐसे नहीं खेला जाता। तुमको खेलना ही नहीं आता। लोग बोले हम तो ऐसे ही खेलेंगे। ये बोले-हम ऐसे तो नहीं खेलने देंगे चाहे खेल होय या न होये। इसके बाद बोले खेल खतम पैसा हजम! हम खुश कि चलो इरफ़ान को चैन मिला। कम से कम होली में तो चैन से बैठेगा।
लेकिन फिर देखा कि भैया अपने इरफ़ान को फिर जोत दिहिन। जैसे शाम को ठेकेदार काम बंद करने के बाद फिर से लगा देता है कभी-कभी जरूरी काम होने पर।
उधर से हमारे प्रियंकर भैया बमक गये- आप कैसे बहस स्‍थगित कर सकते हैं?
उधर से धुरविरोधी चिल्लाये जा रहे हैं हम नफरत फैलाने नहीं देंगे, वाट लगाने नहीं देंगे। नफरत का गाना गाने नहीं देंगे। जहर फैलाने नहीं देंगे। हमें लगा कि आगे की कड़ियां हो सकती हैं खाट खड़ी कर देंगे/ खाट खड़ी नहीं करने देंगे, चाट खिला देंगे/ चाट खाने नहीं देंगे, परदा गिरा देंगे/परदा गिरने नहीं देंगे( यशपाल की कहानी परदा)। हमें तो एकबारगी यह भी लगा कि मोहल्ले वाले और धुरविरोधी कोई मैत्री मैच खेल रहे हैं। इधर से मोहल्ले वाले ने गेंद फेंकी नहीं उधर से धुरविरोधी ने गेंद के धुर्रे उड़ा दिये। अब स्ट्राइक बदलने के लिये इधर से अभिषेक भी जुट गये। इस चक्कर में प्रत्यक्षा के इरफ़ान को घरेलू टाइप बताकर किनारे कर दिया गया कि भाई जरा कुछ सनसनाता सामाजिक उदाहरण पेश करो। बेंगाणी बन्धु तो बेचारे मोदी गुजरात के हैं, उनकी कौन सुनता है।

यह है फुरसतिया जी का सहायता करने का तरीका. हमें पता चलने भी नहीं दिया और चर्चा लिखने में मदद कर के चले गये. बहुत धन्यवाद, महाराज. तो एक मददगारी वाला पहलू तो आप जान गये, अब उनके व्यक्तित्व का संवेदनशीन पहलू देखें:

चलते-चलते मैंने कहा कल इतवार को फैक्ट्री चलेगी आप आइयेगा थोड़ी देर के लिये। नवी
साहब चूंकि फोरमैन थे। उनको ओवरटाइम नहीं मिलता था इसलिये उनको आने की बाध्यता नहीं
थी। लेकिन जब मैंने कहा आप आइये तो वे मुस्कराते हुये बोले अच्छा, आप कहते हैं तो आ
जाउंगा आपके साथ चाय पीकर चला जाउंगा।
अगले दिन सबेरे फोन की घंटी बजी। फोन नवी
साहब के घर से था। उनको दिल का दौरा पड़ा था। मैंने तुरन्त उनको अस्पताल में लाने को
कहा और वहां पहुंचकर उनका इंतजार करने लगा। मैं यह सोच भी रहा था कि नवी साहब को
हड़काउंगा, ‘ये कौन तरीका है आने का भाई?‘
लेकिन हमको उन्होंने कोई मौका नहीं
दिया। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उनकी सांसे थम गयीं थीं। उस दिन मैं जिंदगी में पहली
बार किसी की मौत पर रोया। वह मेरे जीवन का ऐसा वाकया था कि जब याद करता हूं आंसू आ
जाते हैं।

और उदगार:

अपने देश में तमाम समस्यायें हैं। गरीबी, अशिक्षा, जनसंख्या, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सम्प्रदायवाद, जाति वाद,भाई भतीजा वाद। कौन किसके कारण है कहना मुश्किल है। मुझे तो लगता है कि सब एक दूसरे की बाइप्रोडक्ट हैं। इनका रोना रोते-रोते तो आंख फूट जायेगी। कोई फायदा भी नहीं रोने से। हो सके तो अपनी ताकत भर जहां हैं जैसे हैं वैसे इनसे निपटने की कोशिश करते रहें बस यही बहुत है।

खैर, मौहल्ला से लेकर फुरसतिया जी तक के सारे आलेख इत्मिनान से पढ़ियेगा मन लगाकर. कुछ धड़म धड़ाम की इच्छा जागे तो इस पर कुछ लिख भी डालिये, काल्पनिक भी चलेगा मगर लगे यथार्थ सा. फिर और लोग आयेंगे, फिर और बात बढ़ेगी, फिर से हम आयेंगे और चर्चा कर चले जायेंगे. 🙂 अभी तो मौका है, होली है, थोड़ा ऐसा मसाला भी चलेगा जो अन्य मौकों पर शायद नहीं चल पाता.

अरे हाँ, होली को बचे ही कितने दिन हैं. भांग तो घुटने भी लगी, लोग मस्तिया रहे हैं, यह देखो. गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल जी को, फिर कहना कि होली के सिवा कभी देखे हो इनके इस रुपहले अंदाज को: होली और हो ली पर :

पार्किंग में श्रीजी को पुलिस ने दबोच लिया
ईव टीजिंग कर रहे हो शर्म नहीं आई है
पढ़े लिखे इज़्ज़तदार देखने में लग रहे हो
फिर बोलो कैसे ऐसी धूर्तता उठाई है
श्रीजी ने हाथ जोड़ कहा, सुनें आफ़ीसर
ईव जिसे कह रहे हो, धर्म पत्नी मेरी हैं
शापिंग से ये लौटी, मुझे पहचान पाईं नहीं
चेहरे पे मेरे क्योंकि दाढ़ी बढ़ आई है

बाकी तो वहीं जाकर पढ़ो, बहुते खूब है, इसी मौके पर हमारे मसिजिवी निलिमा के प्रश्नों का जवाब दिये हैं अपनी अलग होलिया अदा में: कह्ते हैं हमार का करिबै नीलिमा…जबाब फागु की पिचकारी से … ये लो करलो बात होली की उमंग इनसे बरजास्‍त नहीं होती।

हमारी पसंद इनके जबाब में:

वह बहुत मामूली बात जो आपको बहुत परेशान किए देती है?

लो कल्‍लो बात। ससुरी बड़ी बात की तो औकात नहीं कि हम परेशान हों। अब नीलिमा की सादी हुई …हुए हम परेशान…। बाजा आदमी होता तो बजीराबाद के पुल से छलांग लगा देता परेशानी में। नहीं भाई लोग हम परेशान नहींए होते। (हम तो पहिले ही कहे थे मान जाओ होली पर पंगा मत लो नहीं मानी…अब पता नहीं क्‍या क्‍या राज खुलेंगे आज।

बहुत ही बढ़िया होली की उमंग में झूले भाई!! बाह, बाह कि वाह वाह!!

ऐसे ही पाँच सितारा जवाब और लोग भी एक से एक दिये जा रहे हैं और कोई कोई तो दो से दो और तीन से तीन:

जानिये सबको:

डॉ भावना कुँवर का जबाब: चमत्कार हो गया ! भई चमत्कार… और हाज़िर हैं एक ब्रेक के बाद राकेश जी के लिये: दूसरा वाला काव्यात्मक है और हो भी क्यूँ न, गीत सम्राट को समर्पित जो है.

हरिराम के क्म्प्यू से…जवाब : टैग-वार्ता के कहते हैं कि अब मेरे कुछ प्रश्न हैं जिनका उत्तर अपेक्षित सभी हिन्दी के विद्वानों से– (अभी हिन्दी ब्लागिंग गुरुओं से सम्पर्क स्थापित कर रहा हूँ, जिन्हें टैग बाद में करूँगा।) तो हम बच गये, मगर फंसे कौन, यह तो जबाब देने वालों को देखकर बाद में समझ आयेगा. 🙂

जवाब तो रंजू जी ने भी दिये है मगर हमारी पोस्ट पर ही टिप्पणी के द्वारा दे कर चलीं गईं. निवेदन है कि वो इसे अपने चिट्ठे पर पोस्ट के माध्यम से दें.

अभी यह दौर जारी है, लोग अटकाये जा रहे हैं, लोग भटकाये जा रहे हैं और सच मानो तो कुछ लोग हड़काये जा रहे हैं. मगर जैसा कि होता है, दूसरे फंसे तो मजा तो बहुत आता है, तो सब मजा ले रहे हैं.

अब, एक अति आवश्यक सूचना:

बकौल जीतू भाई:

काफी समय के अन्तराल के बाद अनुगूँज फिर से आपके सामने प्रस्तुत है। इस बार अनुगूँज का आयोजन कर रहे है, तरुण भाई, जो निठल्ला चिंतन करते है। इस बार का विषय है, हम काहे बताएं, आप खुद ही यहाँ जाकर देखो ना।

हमारे कई नए साथियों को पता नही होगा कि अनुगूँज क्या है। अक्सर हम अपने साथी चिट्ठाकारों से किसी विषय विशेष पर उनके विचार जानना चाहते है। हो सकता है किसी मुद्दे पर सभी लोग विचारों से सहमत हो अथवा नही, लेकिन आपको आपके विषय विभिन्न विचारधाराओं को जानने का मौका मिलता है। सभी लोगों के विचारों के सामने लाने के लिए अनुगूँज का मंच प्रदान किया गया है। पहले यह आयोजन पाक्षिक किया जाता था, काफी समय से आयोजन नही हुआ।

सभी चिट्ठाकारों से उम्मीद की जा रही है कि वो इसमें सम्मलित हो अपने विचार रखेंगे. अनुगूँज की सफलता के लिये शुभकामनायें और इसे रुके हुये आयोजन को फिर से हवा देने के लिये तरुण भाई को साधुवाद और बधाई.

जिस वक्त हमारे लखनऊ वासी अमेरीका मे रह रहे अतुल श्रीवास्तव जी एक आदमी और एक देश के दो दो तीन तीन नाम बता कर अमेरीकन को अचंभित कर रहे हैं कि भारत घर का नाम, इंडिया बाहर का और हिन्दुस्तान तीसरा. जैसे कि रिंकू या चिंकू का बाहर का नाम पुनीत और सुनीत…आदि आदि. ठीक उसी वक्त लोग दो दो ब्लागों के एक ही नाम से रिवर्स परेशानी का सामना करते पाये गये अंतर्मन, एक ब्लाग और जिसकी चर्चा नहीं हुई वो भी दो ब्लागों का नाम है जैसे रंजू जी का चिट्ठा कुछ मेरी कलम से.

अब रेपिड फायर राऊंड कविता का:

खूनी सागर स्वर्णा ज्योति जी की पेशकश. और सुनिये योगेश समदर्शी को: सबसे सुंदर और टिकाऊ पति को:


दौर है बाजार का,
हर हुनर एक माल है.
आंकडौं का खेल है,
सैंकडों की चाल है.

बहुत करारा और गहरा व्यंग्य, व्यवस्था पर चोट, बधाई.

और सुनिये, टू फेसेस पर हरिवंश राय बच्चन जी को: अंधेरे का दीपक

रुमी हिन्दी पर जादूगर:


जादूगर तुम अनोखे हो निराले हो.।
शिकारी, शिकार को बनाने वाले हो॥

और हमारे मोहिंदर भाई को सुनें हिन्द-युग्म पर: दोषी कौन

हमें ही चिन्हित करना है
कौन है दोषी यदि
हर मानव के पेट में अन्न नही है
हर पांव में नही है जूता
क्यों कोई पटडी पर है लेटा
क़्यों इतने हाथ पसर रहे हैं
क्यों हैं इतने दुखियारे
किसने है सारा सुख समेटा

पीडा, पीडा में अन्तर अगम है

वाह, वाह, बहुत खूब ( और यह पढ़कर किया है वाह, वाह, तो हल्के में मत लेना) 🙂 देबाशिष भी सुन लें, हा हा!!

आज जगदीश भाई का आईना निवेषकों को आईना दिखा रहा है कि सही गलत को पहचानों और कहीं एल आई सी ऐजेंटों द्वारा की जा रही गलत पेशकश का पर्दाफाश कर रहे हैं, जगदीश भाई का धन्यवाद ऐसे आँख खोलू लेख के लिये. भविष्य में भी वो इसी तरह चिट्ठे के माध्यम से ज्ञानवर्धन और आगाह करते रहेंगे, ऐसी उम्मीद की जा रही है.

माँ बाप को समर्पित भगवान सलामत रहें माँ बाप हमारे ! नीरज की पोस्ट को साधुवाद.
और हँसने हँसाने के लिये महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर जी लाये हैं कई सारी मसाले दार चटपटी पोस्टें. सभी पठनीय हैं.

पढ़ो, खूब पढ़ो जैसे अगले एक महिने तरस जाओगे नितिन बागला जी को देखने क्योंकि उन्हे दस ठो एक से एक गजब की किताबें मात्र १०० रुपये में हैदराबाद में मिल गई हैं और वो अगले एक माह तक उन्हें पढ़ेंगे, उसके बाद ही अब आप उनको पढ़ेंगे. चलो किसी का तो कहीं और मन लगा.

ताजा उत्प्रेरक प्रसंगो के लिये हमेशा पढ़िये, लोकमंच और हिन्दी चिट्ठाकारी के व्यवसायीकरण पर अमित द्वरा लिखे लेख की जानकारी लिजिये रवि रतलामी जी से. अरे कहाँ चले, बस काम की सुनी और चल दिये. यह गलत बात है, कहानी भी तो पढ़ते जाओ: कल्लो और कस्बा पर रविश की रिटेल साहू , बहुत बेहतरीन लगीं दोनों हमे तो. अब आप भी पढ़ो.

सुनील दीपक जी जो कह न सके वो हम बताते हैं: जो हुआ वो क्यों हुआ? और अंत मे, स्वागत योग्य कदम के लिये हमारे भाई श्रीश को बहुत बधाई प्रथम हरियाणवीं चिट्ठे के लिये.

यह हमारी होली के पहले आखिरी चर्चा है तो आप सबको होली की बहुत रंग बिरंगी शुभकामनायें और बधाई.

बहुत सारे चिट्ठों में अधिक अधिक से कवर करने का प्रयास किया मगर फिर भी छूट ही गये होंगे, क्षमा चाहूँगा.

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यह प्रविष्टि चिट्ठा चर्चा में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

5 Responses to दीवाने हो भटक रहे हो मस्जिद मे बु्तखानों में

  1. Udan Tashtari कहते हैं:

    नितिन बागला जी का लिंक लगाना रह गया था,माफी चाहूँगा.वो यह रहा: महिने भर का किताबी मसाले का:http://saptrang.wordpress.com/2007/02/27/got-some-hindi-books/

  2. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    बढ़ते चिट्ठो का दबाव साफ दिखाई दे रहा है, हास्य की पुट चिट्ठो को शामिल करने के चक्कर में गायब हो रही है. रास्ता निकालें. आपने काफी परिश्रम किया है, साधूवाद.

  3. Shrish कहते हैं:

    संजय जी की बात से मैं भी सहमत हूँ। चर्चाकारों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। मेरे विचार से अब इतने कवि हो चुके हैं उनमें से कुछ भाई कविताओं की चर्चा रोज अलग से किया करें। इस तरह कविताओं की भी चर्चा ज्यादा अच्छी तरह हो सकेगी और चर्चाकारों पर दबाव भी कम होगा।

  4. Pankaj Bengani कहते हैं:

    इरफान इरफान का खेल देखने में आनन्द आ रहा है, लालाजी| मौज लिजीए आप भी. बडे बुजुर्ग बच्चों की तरह लडें, तो अच्छा ही है ना| समरसता बनी रहती है! 😉

  5. भाई संजय जी श्रीशजी, नहीं बात है यह कविता कीएक व्यक्ति जब एक दिवस में दर्जन भर पोस्ट कर देताचर्चाकार समय जितना दे पाता है उन को पढ़ने मेंउतने में एक नहीं दो तीन अलग चर्चा कर देता.अभी देखिये, मिर्ची सेठ गये हैं गिनती दस तक देकरलोकमंच ने आधा दर्जन पर किस दिन संतोष किया हैअब तो बढ़ने लगी समस्या,काम करें, पढ़ लें या लिख लेंपर चर्चा भी करनी होगी, यह भी तो संकल्प लिया है

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