धर्म से पहले जीवन आता है

सूचक आशावान व्यक्ति हैं, अब भी टीवी बहसों में मर्यादा की अपेक्षा रखते हैं

एक चैनल को क्या सूझी कि वो दो समझदारों के साथ “वन साइज डजेंट फिट एवरी वन” पर बहस करे…सवाल ये है कि क्या ये बहसें अपनी मर्यादा जानती हैं? जिस कार्यक्रम की बात यहीं हो रही है उसमें सभी हंस हंस कर ये बता रहे थे कि साइज से क्या, क्यों और कैसे…वे हंस क्यो रहे थे! शर्म से।

महंगाई जैसे विषयों पर सरोकार रखने वाले छद्म लेखों के बाद लोकमंच अब अपनी औकात पर आ रहा है। भले ही ख़बरों के थाल पर परोसा जा रहा हो पर खोमचा वैमनस्य का ही है। “इस्लाम के अपमान के नाम पर ब्लागर को चार साल की कैद“, “पाकिस्तान में नये पाठ्यक्रम का कट्टरपंथियों ने विरोध किया” जैसी खबरोंं को प्रमुखता।

इस्लाम और मुसलमान शब्दों के प्रति भारतीय पूर्वाग्रह अद्वितीय है। यह विषय हिन्दी ब्लॉग जगत में गये हफ्ते से इरफ़ान के रूप में छाया रहा। मोहल्ले में इरफ़ान के हवाले से अविनाश ने एक लेख लिखा, मुद्दे सही पर ट्रीटमैंट अतिनाटकीय। यह चर्चा मुद्दे पर ही। ओम ने प्रतिक्रिया में कहा, “मैं तो हिंदू हूं पर दिल्ली में बिहारी कहा जाता हूँ…मुझे घिन्न हो गई हैं ऐसी व्यवस्था से…”। प्रियंकर ने लिखा, “समाज में कई स्तरों पर जाति, धर्म और भाषा को लेकर भेदभाव भी है। सारा के साथ स्कूल में अंडे वाली घटना को समाजीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा मान कर देखना चाहिये जो बहुधा संख्याबहुलता से अनुकूलित होती दिखाई देती है। कोलकाता में मेरे बेटे को यदि रहना और पढना है तो उसे मांसाहारी वातावरण में ही रहना होगा…इसे किसी सामाजिक अन्याय की तरह देखने की बजाय समाजशास्त्रीय प्राचलों के आधार पर देखना बेहतर होगा”। मैं सहमत हूँ।

पर यह हमारा ही समाज है जहाँ सहस्त्रों बरसों पहले मुस्लिम शासकों ने जो किया उसकी दुहाई देकर आज तक मुसलमानों को कोसा जा रहा है। उन्हीं मुग़लों का बनाया ताजमहल बस एक हेरीटेज मोन्यूमेंट है। और जिन अंग्रेज़ों ने २०० सालों तक पैरों तले रौंदा उनकी भाषा और संस्कृति के तलुवे चाटने में ज़रा भी हया नहीं। मुसलमान शासक काफ़िर हमलावर रह गये और अंग्रेज़ हमलावर सॉफिस्टीकेटेड शासक। मदरसा बुरा है, पर मिशनरी स्कूल और वैदिक स्कूल दूध के धुले हैं। मदरसों से हर बच्चा आतंकवादी हो कर निकलता है और बाकी स्कूलों से कल्चर्ड अंग्रेज़ बन कर। भारतीय कौन सा स्कूल बना रहा है फिर आजकल? क्या हम अब भी उपनिवेश नहीं हैं? जगदीश ने कहा, “यह जो दुनिया-समाज हम सारा को दे रहे हैं न अविनाश, यह तुम्हारी, मेरी और मोदी जैसों की ही बनाई है और हमीं को ध्यान देना होगा इस तरफ।” मुनीश ने लिखा, “ये दुखद सत्य है कि अधिकाँश मुसलमान धर्मांध हैं, मुट्ठी भर लोग की पढ़े लिखे और प्रगतिवादी हैं। जब पाकिस्तान क्रिकेट मैच जीतता है तो वे खुशियाँ मनाते हैं”। यह भारत में ही हो सकता है जहाँ इस तरह के फोकलोर प्रचुरता से मशहूर हों, मुसलमान अशिक्षित है, मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा करता है, मुसलमान आतंकवादी है। इन्हीं के दम पर मुख्याधारा से इन्हें अलग रखिये, अपना न बनने दीजीये और “मुसलमान के घर कटार पर हिन्दू के यहाँ तो कुत्ते भगाने के लिये लाठी तक नहीं होती” के आग्रह पर कट्टरता को गाली देते हुये खुद कट्टर बन जाईये। मस्त देस है मेरा! जीवन से पहले धर्म आता है यहाँ। धुरविरोधी की तरह कहने को जी करता है कबीरः

कितना दुर्बल धर्म हमारा एक पशु गन्दा कर जाता
और एक पशु की खातिर ही भारत आपस में लड़ जाता
इससे तो मैं भला नास्तिक, चादर ताने सो रिया
गणपति बप्पा मोरिया।

चलते चलतेः भारतीय और अतर्राष्ट्रीय सिनेमा पर एक नया ब्लॉग सिलेमा प्रशंसनीय है अगर पढ़ा न हो तो आज ही पढ़ें।

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8 Responses to धर्म से पहले जीवन आता है

  1. अफ़लातून कहते हैं:

    ” उन्हीं मुग़लों का बनाया ताजमहल बस एक हेरीटेज मोन्यूमेंट है। ” देबाशीष, अभी आपको अन्दाज नहीं है।राष्ट्रतोड़क -राष्ट्रवा्दी साहित्य में दरअसल”ताजमहल मन्दिर भवन” है ।इस नाम की पुस्तक,’गांधी वध क्यों?’ आदि के साथ बिकती है।हिटलर को महिमा मण्डित करने वाला साहित्य भी वहाँ उपलब्ध रहता है।लापता रहती है गुरु गोलवलकर की लिखी,”We or our Nationhood Defined” उनके शताब्दी-वर्ष में उनके नाम से बहुभाषी जाल-स्थल बने लेकिन अब तक उनके वांग्मय का उल्लेख नहीं किया गया है और न ही उनकी लिखी इस किताब को बिना सम्पादित किए पुनर्प्रकाशित करना उचित समझा गया है।’अपने पूज्य गुरुजी’ पर भी सेंसर!

  2. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    देबूदा आपको पढ़ कर अच्छा लगा. अमुमन वैसे तो आप ऐसे विषयों पर लिखते नहीं, चर्चा के बहाने ही सही कुछ कहा तो सही.तथा अफलातुनजी दुनिया को एक आँख से न देखें. अगर कट्टर हिन्दू इतने ही बुरे होते तो हर तोड़-फ़ोड में, जलती रेलो में उनका भी नाम आता. हिन्दूओं की कट्टरता एक प्रतिक्रिया है. बाकि आप अच्छी तरह से जानते है, मैं ढ़ोंग नही कर सकता, इसलिए बुद्धीजीवि नहीं हूँ.

  3. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    एक बात तो कहनी रह ही गई. आपने एकदम सही लिखा है :)बस एक बात को छोड़ कर. गुरूकुल पता नहीं कहीं शिक्षा देते हैं या नहीं, हाँ स्कूल व मदरेसो को समान न कहे. आँखे उठा कर आस-पास देखें जितनी भी चीजे दिख रही है,वे स्कूल से निकले लोगो ने बनाई है. अब शुक्र मनाईये की मदरसो से निकलने वाले जो बना सकते है, उससे आप बचे हुए है.

  4. शशि सिंह कहते हैं:

    सही मायनों में चिट्ठा-चर्चा. हालांकि सबकी अपनी-अपनी हो सकती है मगर हमेशा से मेरी पसंद वैसी चर्चायें रहीं हैं जिसमें चर्चाकार अपनी पसंद के कुछ चिट्ठों को अलग-अलग नजरिये से व्याख्या करें. इस दृष्टि से देबू दा अंदाज मुझे भाता है.

  5. avinash कहते हैं:

    मैंने इरफान के बहाने नहीं लिखा देबाशीष्‍ा जी। इरफान ने खुद ही लिखा है। मोहल्‍ले में हमारा लिखा हुआ आप शायद नहीं के बराबर पाएंगे। इंट्रो के सिवा। इसलिए अपनी समीक्षा में तथ्‍य का मसला थोड़ा दुरुस्‍त रखें। शुक्रिया।

  6. avinash कहते हैं:

    वैसे आपने चर्चा में ज़रूरी बातें उठायी हैं, इसके लिए शुक्रगुज़ार हूं।

  7. Debashish कहते हैं:

    देबाशीष, अभी आपको अन्दाज नहीं है। राष्ट्रतोड़क – राष्ट्रवा्दी साहित्य में दरअसल “ताजमहल मन्दिर भवन” हैबिल्कुल ख़बर है अफलातून जी। 2004 में लिखी मेरे अंग्रेज़ी ब्लॉग के इन लेखों को पढ़ें:http://nullpointer.debashish.com/background-cleansinghttp://nullpointer.debashish.com/the-asi-mockery

  8. Debashish कहते हैं:

    मैंने इरफान के बहाने नहीं लिखा। इरफान ने खुद ही लिखा है। अपनी समीक्षा में तथ्‍य का मसला थोड़ा दुरुस्‍त रखें।अविनाश जानकारी दुरस्त कर ली गई है।

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