अंतर्जालीय चेंगड़ों का दिवंगतों को श्रद्धा सुमन


भारत के सृजनाकाश के कुछ चमकते सितारे पिछले दिनों अस्त हो गए. हिन्दी साहित्य के – डॉ. ब्रजेन्द्र अवस्थी का इंतकाल पिछले हफ़्ते हुआ. इधर महान साहित्यकार, संपादक व पत्रकार कमलेश्वर के इंतकाल की खबर आई ही थी कि भारत के एक महान संगीतकार ओ.पी.नैयर के स्वर्गवास की खबर आई. चिट्ठाचर्चा की ओर से दिवंगतों को श्रद्धा सुमन.

ओ.पी.नैयर को अपने चिट्ठों के माध्यम से श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे हैं – मनीष, नीरज, और जगदीश

बड़े दिनों बाद लाल्टू नजर आए नेवला लेकर. उम्मीद करते हैं कि अब उनका संपेरा नित्य रचनाओं की बीन बजाया करेगा. एक नया अनगढ़ कच्चा चिट्ठा अवतरित हुआ है और इस चिट्ठे से, इसके नाम के विपरीत, बहुत सी गढ़ी और गूढ़ बातें नित्य पढ़ने को मिलेंगीं.

आज का चर्चित चिट्ठा रहा फ़ुरसतिया का लिखा – काव्यात्मक न्याय और अंतर्जालीय ‘चेंगड़े’

यह चिट्ठा वैचारिक भिन्नताओं को लेकर व्यक्तिगत स्तर पर की गई टिप्पणियों का प्रत्युत्तर स्वरूप लिखा गया है. इस चिट्ठे को पढ़कर, हिन्दी ब्लॉगर टिपियाते हैं –

अंतर्जालीय चेंगड़ा विवाद पर आपका लंबा पोस्ट पढ़ कर यही लगा कि इस पर इतनी ऊर्जा ख़र्च करने की ज़रूरत नहीं थी. सच कहूँ तो आपका ताज़ा पोस्ट कमलेश्वर जी पर केंद्रित रहने की अपेक्षा थी.

कुछ इन्हीं मायनों के साथ अनूप की टीप है-

विवाद में कौन सही है और कौन गलत , ये तो नहीं जानता और ना ही ये जानना मायने रखता है लेकिन यदि ऐसी बातों से खिन्न हो कर आप के लेखन पर प्रभाव पड़े या आप का लेखन कम हो जाये तो यह हिन्दी ब्लौग जगत की क्षति होगी । इस आशा के साथ कि ऐसा नहीं होगा ।

एक और टिप्पणी पड़ी है संजय की :

अखरी तो केवल एक बात कि इस लेख में वो वाली व्यंग्यात्मक पुट नहीं थी, जिससे कायल हो आपकी लम्बी-लम्बी पोस्टें पढ़ते रहे है.

मेरी कोई टिप्पणी नहीं है वहाँ. अगर मैं कुछ टिपियाता तो इनमें से कोई एक या ऐसा ही कुछ टिपियाता.

मेरे विचार में, हिन्दी चिट्ठाकार जगत में फ़ुरसतिया बहुतों के बड़भैया हैं, और रहेंगे. और, उनके बहुत से विचारों के लिए तो मैं भी उनका सगर्व चेंगड़ा हूँ. पहले भी उन्होंने चिट्ठाकारों के आत्मसम्मान के बहुत से विवाद चुटकियों में सुलझाए थे, और भविष्य में भी सुलझाते रहेंगे.

वैचारिक भिन्नताएँ हम सब में होती हैं. एक जैसे विचार, रूप रंग तो पत्थरों के भी नहीं होते, और हम तो मनुष्य हैं. अपनी-अपनी वैचारिक भिन्नताओं को समक्ष रखना और प्रस्तुत करना भी जरूरी है. उससे भी जरूरी यह बात है कि उन भिन्नताओं को सार्वजनिक स्थल पर रखते समय व्यक्तिगत स्तर पर छींटाकसी या भाषा के अनर्थक प्रयोग से बचाया जाए.

दूसरी बात, व्यक्तिगत वैचारिक भिन्नताओं को जगजाहिर करने से भी बचा जाना चाहिए. कुछ अरसा पहले मेरे कुछ विचार मेरे कुछ चिट्ठाकार मित्रों को नहीं जमे. उन्होंने सार्वजनिक स्थल पर इसकी आलोचना की. आलोचना की भाषा के सवाल पर कुछ प्रश्न भी उठे. मैंने उनका प्रत्युत्तर सार्वजनिक रूप से ही दिया, परंतु अप्रत्यक्ष, संयत रूप से दिया. किसी अन्य को इस उत्तर प्रत्युत्तर के सिलसिले के बारे में भनक ही नहीं पड़ी. सार यह कि अपनी बातें कहते समय भाषा का प्रयोग संयत रूप से रखना ही होगा. संयत भाषा में कही गई कड़वी से कड़वी बात भी आदमी पचा लेता है, परंतु असंयत भाषा में प्रेम का इजहार भी असह्य होता है.

तीसरी बात, हिन्दी चिट्ठों की लोकप्रियता और उसकी बढ़ती संख्या के मद्देनजर इस तरह की समस्याओं से चिट्ठाकारों को भविष्य में जूझना पड़ सकता है. एक सार्वजनिक निवेदन तमाम चिट्ठाकारों से यह है कि वे अपने चिट्ठों में व्यक्तिगत आक्षेप को लेकर की गई टिप्पणियों के हिस्सों को मिटा दें – इससे बेवजह विवाद बढ़ने का खतरा रहता हैं. रहा सवाल व्यक्तिगत आक्षेप वाले चिट्ठा पोस्टों का, तो अभी तो ऐसी कोई गंभीर बात हुई नहीं है, और अगर कभी ऐसा हुआ भी तो नारद जैसे सार्वजनिक स्थलों पर उसका भी बहिष्कार किया जाना चाहिए.

मुझे लगता है कि गांधी से शुरू विवाद अनावश्यक लंबा खिंच गया है. इसे अब यहीं समाप्त किया जाना चाहिए, वह भी गांधीगिरी से. तो आइए, हम सभी चिट्ठाकार बंधु आपस में एक दूसरे को जादू की झप्पी देते हैं और अपने विवादों को भूल कर अपने काम धंधे (चिट्ठा लेखन, टिप्पणी आदान-प्रदान) में लग जाते हैं.

व्यंज़ल

**-**

रूप भले ही धर लूं चेंगड़ों का

व्यवहार कैसे बदलूं केकड़ों का

दम की बात तो कर लूँ मगर

क्या करूँ इन दूषित फेफड़ों का

कोई एक गिला हो तो बात करूं

यहाँ पर तो मुद्दा है सैकड़ों का

दौड़ में मैं अकेला पिछड़ा पैदल

जमाना आ गया है लंगड़ों का

मैं तो बन गया हूँ शिकार रवि

बिना काम पाले हुए लफड़ों का

**-**

चित्र: माई इमेजेस से

About bhaikush

attractive,having a good smile
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6 Responses to अंतर्जालीय चेंगड़ों का दिवंगतों को श्रद्धा सुमन

  1. Jagdish Bhatia कहते हैं:

    चिट्ठाकारों की आचार संहिता ? विचार अच्छा है 🙂

  2. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    व्यंजल मजेदार है. खाश कर केकड़े वाली पंक्ति :)भई अपन तो सबको जादू झपी दे रेला है. कहा-सुनी माफ.

  3. Udan Tashtari कहते हैं:

    चर्चा और व्यंजल दोनों मजेदार रही. 🙂

  4. सागर चन्द नाहर कहते हैं:

    आपके दिये सुझावों से सहमत हूँ मैं आगे ध्यान रखूंगा कि आगे से मैं किसी भी विवाद का निमित्त नहीं बनूं और पोस्ट लिखने या टिप्पणियाँ देने में सावधानी बरतुंगा। आपकी जादू की झप्पी मिल गयी और बहुत गर्मजोश लगी 🙂 चर्चाकारों से अनुरोध है कि यह word verification हटा देवें कई बार टिप्पणीकरने के बाद पोस्ट करते समय गायब हो जाती है और फ़िर वह “मूड” नहीं बनता जो पहली बार में होता है। आज यह टिप्पणी चौथी बार कोशिश और टाईप कर रहा हूँ, और वैसे भी इसको रखने की कोई खास वजह नजर नहीं आती। कृपया मेरी परेशानी पर ध्यान देवें

  5. MAN KI BAAT कहते हैं:

    संयमित-सलाह और सुझाव भरी चर्चा हेतु धन्यवाद। मैंने पिछले एक महीने में ‘मन’ चिट्ठे पर इक्कीस पोस्ट प्रेषित की हैं पर नारद पर कई सारी पोस्ट दिखायी नहीं दी हैं जैसे कल और आज की पोस्ट। चर्चा में शामिल न होने योग्य न रहीं हो -यह तो मुझे समझ आता है पर नारद से नदारद की बात समझ नहीं आ रही । कृपया संभव हो तो बताने का कष्ट करें।

  6. उन्मुक्त कहते हैं:

    रवी जी तो हमेशा ठीक बात कहते हैं पर उनकी यह बात कि, ‘मुझे लगता है कि गांधी से शुरू विवाद अनावश्यक लंबा खिंच गया है. इसे अब यहीं समाप्त किया जाना चाहिए, वह भी गांधीगिरी से.’ एकदम सही है। इसके अलावा कई और विवाद अनावश्यक हैं जो हिन्दी चिट्ठे जगत के लिये ठीक नहीं। विचारों की भिन्न्ता तो जीवन का अंग है और इसे इसी रूप में लेकर समाप्त किया जाना चाहिये।

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