सिंहासन पर बैठा, उनके तमगे कौन लगाता है?

मित्रों चिट्ठा चर्चा में आये अवरोध के लिये क्षमाप्रार्थी है यह दल। मेरी ओर से प्रस्तुत हैं २६ जनवरी के चिट्ठों की संक्षिप्त चर्चा।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर अनूप ने प्रकाशित किया हरिशंकर परसाई का लेख ठिठुरता हुआ गणतंत्र, कितने ही साल पहले लिखा गया पर आज भी प्रभावी।

प्रधानमंत्री किसी विदेशी मेहमान के साथ खुली गाड़ी में निकलती हैं। रेडियो टिप्पणीकार कहता है, “घोर करतल-ध्वनि हो रही है।” मैं देख रहा हूं, नहीं हो रही है। हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं। बाहर निकालने का जी नहीं हो रहा है। हाथ अकड़ जायेंगे। लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं, फिर भी तालियां बज रहीं हैं। मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं, जिनके पास हाथ गरमाने के लिये कोट नहीं है। लगता है, गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है। गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलतीं हैं, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा़ नहीं है।

नैस्डैक के भवन पर भारतीय तिरंगे की छटा दिखा रहे हैं जीतेंद्र पर रचना संशय में हैं

हर दिन की मुश्किल से आम आदमी परेशान है,
आज तक भी गुम नारी की पहचान है,
नौकरी विहीन निराश नौजवान है,
फिर कैसे कह दें? ये देश महान है!

लोकमंच पर पढ़िये सिंगूर का सच और पानी पर राजनीति के शिकार राजस्थान के किसानों की व्यथा

मानव मन भी अद्भुत है। बालपन में माँ बाप उलाहना देते रहते हैं, “क्या छोटे बच्चों की तरह बिहेव कर रहे हो!” जब बड़े हो जाते हैं तो ताने सुनने को मिलते हैं, “आप का तो बचपना अब तक नहीं गया”। तो उमर का तकाज़ा भले हो कि उमर पहचानी जाय, पर उमर बढ़ रही है यह पहचानने में उमर बीत जाती है। गीतकार जी बढ़ती उमरिया की पहचान का लिटमस परीक्षण प्रस्तुत करते हुये कहते हैं

तन की बिल्डिंग की छत पर जब उग आयें पौधे कपास के
बिस्तर पर जब गुजरें रातें, करवट लेकर खांस खांस के
जब हिमेश रेशमिया की धुन, लगे ठठेरे की दुकान सी
याद रहें केवल विज्ञापन जब झंडू की च्यवनप्राश के
बाहर से ज्यादा अच्छे जब दॄश्य लगें घर के अंदर के
सपनों के यायावर, ये हैं लक्षण ढलती हुई उमर के

मनीशा बता रही हैं की तिरुमला मंदिर के चढ़ावे में भगत जाली नोट दे रहे हैं। “देते हैं भगवान को धोखा इंसां को क्या छोड़ेंगे?” पर समीर ने दो टूक टिप्पणी की, “जब अपने आराध्य तक पहूँचने का मार्ग भी पैसा बन जाये तो क्या सच्चा और क्या झूठा. गलत ही सही, मगर वो दर्शन तो कर पाया वरना २४ घंटे लाईन में लगने के बाद भी मात्र ३ सेकेंड के दर्शन होते”

कृष्ण विवर यानि ब्लैक होल, न्यूट्रॉन और पलसर जैसे शब्द यदि आपको उत्साहित करते हैं तो पढ़िये अंतरिक्ष चिट्ठे पर आशीष का यह रोचक आलेख

अंत में एक छोटा सा सवाल, इस प्रविष्टि के शीर्षक को किन लेखक की रचना से लिया गया है? बिना गूगल किये बता सके सकें हों तो हम सब की दाद स्वीकारें।

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यह प्रविष्टि debashish में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

4 Responses to सिंहासन पर बैठा, उनके तमगे कौन लगाता है?

  1. Jagdish Bhatia कहते हैं:

    बिना गुगल किये बता रहा हूं कि अनूप शुक्ला जी के फुरसतिया पर रघुवीर सहाय जी की इस कविता को आज ही पढ़ा था।

  2. Udan Tashtari कहते हैं:

    देबु दा की तरफ से जगदीश भाई को वाह वाह. अब जगदीश भाई ने मंच लूट लिया है तो हम भी देबु भी को चिट्ठाचर्चा के लिये बधाई दे रुखसत होते हैं.

  3. अफ़लातून कहते हैं:

    देर आयद , दुरुस्त आयद !

  4. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    टिप्पणी करना अनिवार्य कर दिया गया है, अतः हमारी टिप्पणी को स्वीकार करें.

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