सफाई का काम एक कला है

आज जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं तो साल का आखिरी हफ्ता चल रहा है। एक तरह से मेरी नियमित चर्चा की यह आखिरी पोस्ट है। साल की समापनी पोस्ट जीतेंद्र लिखेंगे क्योंकि उस दिन उनकी ही बारी है।

चर्चा की शुरुआत जब हुयी तो इसे नियमित जारी रख पाना मुश्किल लग रहा था। लेकिन फिर साथियॊं के सहयोग से ऐसा हुआ कि अब नियमित चर्चा हो रही है। सच पूछा जाये तो चर्चा का आलम यह है कि पोस्ट कम पड़ जाती हैं जिनकी चर्चा की जाये। लिखने वालों में अतुल और देबाशीष कभी-कभी देर कर देते हैं(हमारी देरी, देरी थोड़ी मानी जायेगी) । अतुल कुछ अपने काम के सिलसिले में व्यस्त हैं। जबकि देबाशीष निरन्तर, इंडीब्लागीस के अखाड़े को सजाने में लगे हैं।

राकेश खंडेलवाल जी का कविता में चर्चा करने का मेरे ख्याल में अनूठा है। बीच में समीर जी की कुंडलियामय चर्चा का बेसब्री से इंतजार होता रहा। हालांकि कुछ साथियों ने यह शिकायत भी की कि हर जगह कविता धंसी है। लेकिन मुझे लगता है विविधता इस चर्चा की खाशियत है और इसे बने रहने चाहिये। तुषारजोशी कुछ ठंडे से पड़ गये मराठी चर्चा से और पंकज को लगता है चुनाव ने बुखार ने जकड़ लिया इसीलिये गुजराती चिट्ठाचर्चा भी कुछ ढीली है। निठल्ले साथी अब देखते हैं आगे कितनी जल्दी-जल्दी लिखना शुरू करते हैं।

चिट्ठाचर्चा में अभी तक कोई मानक अंदाज नहीं बन पाया। अतुल, जीतेंद्र और अभी रविरतलामीजी की केबीसी-III स्टाइल में पेश की गयीआखिरी पोस्ट के पेश करने का अंदाज लोगों ने बहुत पसंद किया। संजय के हाथ में काफ़ी का मग लिये चिट्ठादंगल के किस्से का लुत्फ लेने का अलग ही मजा है। लेकिन कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि इस शानदार अंदाज में पोस्ट जिसका किया जा रहा है वह गौड़ सी हो जाती है। शायद आगे आना वाला समय इसका व्याकरण तय करे लेकिन यह मेरी फिलहाल की सोच है।

एक बात कभी-कभी इस बारे में उठती है कि मेरी चर्चा के लिये चिट्ठे नहीं हैं या मेरा चिट्ठा छूट गया। पहले चिट्ठा छूट जाने की बात। आम तौर पर चर्चा करने वाले साथी देखते हैं कि नारद में जिस चिट्ठे तक कवरेज हो गया है उसके बाद के चिट्ठे के बारे में लिखा जाये। लेकिन अक्सर होता है कि चिटठे की वह पोस्ट दिखती नहीं। यह या तो इसलिये होता है कि नारद में ब्लाग है नहीं या फिर इसलिये कि आपने जब अपनी पोस्ट लिखनी शुरू की तबसे और पोस्ट पोस्ट करने में एकाध दिन का समय हो जाता है। और इसी चक्कर में जब आपकी पोस्ट आती है तो वह दूसरे पेज पर चली जाती है। इसलिये यह अच्छा रहेगा जब आप अपनी कोई पोस्ट लिखें तब अपने ड्राफ्ट को फाइनल करके नयी पोस्ट में ही डालें!ड्राफ़्ट को ही प्रकाशित करने से पोस्ट पुरानी पोस्टों में चली जायेगी। खासतौर से ब्लागस्पाट वाले साथी इस पर ध्यान दें।

चर्चा के लिये चिट्ठे न होने की बात भी पर भी मुझे यह लगता है कि अगर चर्चा के लिये पर्याप्त पोस्ट नहीं हैं तो अगर ठीक समझें तो उस पोस्ट की चर्चा विस्तार से की जा सकती है जिसे किसी चर्चा में अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाया या किसी कारण वश वह छूट गयी। जीतेंद्र ने पिछले साल की पोस्ट भी लिखनी शुरू की थी।

तो ऐसे में जबकि आज के अधिकांश चिट्ठों की चर्चा हो चुकी हैं हम साल के इस आखिरी सप्ताह की अपनी चर्चा पोस्ट पेश करने जा रहे हैं। कुछ और लिखने के पहले बता दें कि वर्ष २००६ के सबसे अच्छे चिट्ठाकार के चुनाव नजदीक आ गये हैं। कुल ३० चिट्ठाकारों के नामांकन आ चुके हैं। उसमें से १० अच्छे चिट्ठों का चयन निम्न लोग करेंगे:-
१.रवि रतलामी
२.अनूप शुक्ला
३.जीतेंद्र चौधरी
४.संजय बेंगाणी
५.प्रतीक पांडेय

इसके बाद वोटिंग का दौर शुरू होगा। तब तक आप अपने सबसे अच्छे चिट्ठाकार के बारे में निर्णय लेने का काम शुरू कर दीजिये।

आज की पोस्टों में सबसे चर्चित रही श्रीश जी पोस्ट जिसमें उन्होंने शहीद उधम सिंह को याद किया है। शहीद उधम सिंह के बारे में लिखते हुये श्रीश लिखते हैं:-

आज फैशन है कि गांधीवाद का, गांधीगिरी का भगवान को गाली दो लेकिन गांधी की जरा भी आलोचना न करो। अब आप कहेंगे कि इसमें गांधी का क्या कसूर है, है कसूर लेकिन उसकी बात कभी बाद में अलग से करुँगा। हमें पढ़ाया जाता है, बताया जाता है यही सब। गांधी जी ने अफ्रीका से आने के बाद अंग्रेजों की कभी एक लाठी भी न खाई।


मजे की बात है कि इतने के बावजूद जब आशीष लिखते हैं :-

लेकिन मेरी समझ मे ये नही आता कि उधमसिंह की महानता गांधी नेहरू की आलोचना करने से कैसे बढ जायेगी ? क्या किसी भी शहीद को महान सिद्ध करने के लिये उसे किसी और से तुलना करना(किसी और की आलोचना) जरूरी है ?


तो पंडितजी बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं:-

आशीष भाई, पोस्ट ध्यान से पढिए। मेरा निशाना गांधी नहीं उनके तथाकथित चेले हैं जो जानबूझकर अन्य शहीदों का अपमान करने पर तुले हैं। इसका एक सामान्य उदाहरण था अंडमान-निकोबार में वीर सावरकर का चित्र हटाया जाना।


अब जब तक आशीष ध्यान से पढ़ें तब तक आप शहीद उधमसिंह के बारे में जानकारी प्राप्त कर लें:-

क्रांतिवीर उधम सिंह का जन्म पंजाब-प्रांत के ग्राम सुनाम (जनपद – संगरुर) में २६ दिसंबर १८९९ को हुआ था। इनके पिता का नाम टहल सिंह था। वर्ष १९१९ का जलियांवाला बाग का जघन्य नरसंहार उन्होंने अपनी आँखों से देखा था। उन्होंने देखा था कि कुछ ही क्षणों में जलियांवाला बाग खून में नहा गया और असहाय निहत्थे लोगों पर अंग्रेजी शासन का बर्बर अत्याचार और लाशों का अंबार। उन्होंने इसी दिन इस नरसंहार के नायक जनरल डायर से बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी। प्रतिशोध की आग में जलते हुए यह नर-पुंगव दक्षिण-अफ्रीका तथा अमरीका होते हुए वर्ष १९२३ में इंग्लैंड पहुँचा। वर्ष १९२८ में भगतसिंह के बुलाने पर उन्हें भारत आना पड़ा। १९३३ में वह पुनः लंदन पहुँचे। तब तक जनरल डायर मर चुका था, किंतु उसके अपराध पर मोहर लगाने वाला सर माइकल-ओ-डायर तथा लॉर्ड जेटलैंड अभी जीवित था।


आगे शहीद उधमसिंह की वीरता और बलिदान का जिक्र करते हुये श्रीशजी ने लिखा:-

आज जिस लोक में वे हों क्या उन देशभक्तों को उनकी उपेक्षा पर दुख हो रहा होगा ? बिल्कुल नहीं क्योंकि उनका जीवन गीता के निष्काम कर्म का जीवंत उदाहरण था। उनकी खासियत ही यही थी कि उन्हें बस सरफरोशी की तमन्ना थी बदले में कुछ चाहते होते तो कांग्रेसियों की तरह धरने-सत्याग्रह करते और नेता बनते।


आज की दूसरी उल्लेखनीय पोस्ट है शैशव में सफाई के महत्व को रेखांकित करती हुयी पोस्ट! इसमें गांधीजी कहते हैं:-

‘मेरा बस चले तो उस रास्ते को झाड़ू लगाकर साफ-सुथरा कर दूँ। इतना ही नहीं, बल्कि वहाँ फूल के पौधे लगा दूँ। रोज पानी दूँ और आज जहाँ घूरा है , वहाँ सुन्दर-सा बगीचा बना दूँ। सफाई का काम एक कला है, कला।’

अफलातूनजी आगे बताते हैं:-

बापू ने जिन संस्थाओं की स्थापना की , उनका मुख्य दफ्तर उस क्षेत्र की एक प्रयोग-शाला ही बन जाती थी। मगनवाड़ी में एक तरफ तेल घानी चलती थी , तो दूसरी तरफ हाथ – कागज बन रहा था। वाड़ी में जगह – जगह मधुमक्खी – पालन की पेटियाँ दिखाई दे रही थीं। विविध प्रकार की आटा पीसने की चक्कियों के प्रयोगों में खुद बापू भी भिड़ जाते। इन उद्योगों के साथ-साथ ग्रामोद्योगों की तालीम देने के लिए विद्यालय भी चलाया जा रहा था। देश – विदेश में अर्थशास्त्र की विद्या पढ़ने के बाद , ‘ भारत के अर्थशास्त्र की कुंजी तो ग्रामोद्योगों में ही है

संजय बेंगाणी बाजार की ताकत के बारे बताते हुये कहते हैं:-

बाजारबाद धन्य है, जो काम ईसाई मिशनरीयाँ शताब्दीयों तक काम कर नहीं कर पाती वह बाजार ने कर दिखाया. जो रौनक दीपावली-ईद पर नही दिखती वह एक ब्लॉगर को क्रिसमस में दिखी. मुझे किसी धर्म से कोई बैर नहीं, बस जो देखा वह लिखा.बाजार का ही प्रभाव है जो, सेलिब्रिटी लोग जिन्हे कम से कम हिन्दी तो नहीं ही आती या फिर अपने स्टेटस को बनाए रखने के लिए उन्हे हिन्दी को भूलने जैसे बलिदान करना पड़ता है वे भी हिन्दी में बोलने पर मजबूर है. कैसे?


इस पोस्ट की तारीफ़ करने के साथ-साथ यह भी कहना चाहूंगा कि अगर संजय भाई साल के शुरूआत में कुछ प्रण-षण करने के चोचले में पड़ते हों और समझ न आ रहा हो कि क्या करें इस साल तो यह सोचें कि लिखने में वर्तनी की अशुद्धियां कम करने का प्रयास करेंगें। तब तक चला लेंगे और ‘बाजा़र’ की जगह ‘बजार’, ‘मिशनरियाँ’ की जगह ‘मिशनरीयाँ’ और ‘शताब्दीयों’ की जगह ‘शताब्दियों’ से काम चला लेंगे। इसमें हम मुस्कराहट के निशान के चक्कर के चोचले में नहीं पड़ रहे हैं।
कविता रीतेश जी लिखी है। कुछ प्रेम से संबंधित है। लेकिन भाव अस्पष्ट से हैं। शायद मुझे ही ऐसा लगा हो। आप लोग भी देखें:-

बस नाम के ही प्रेम हैं मिलते यहाँ पर
नहीं मिलता रामसेवक और कर्मवीर यहाँ
नाम से छोटे हुए आज मेरे कर्म भी
है हमें विस्तार की जरूरत
यह सुकुड़ते नाम का युग है


हालांकि इसका जिक्र हो चुका है लेकिन यदि किसी ने न पढ़ी हो तो समीरलाल जी की गीता सार वाली पोस्ट पड़ ले। मजे की बात यह हल्की-फुल्की मौज-मजे की पोस्ट हमने अभी-अभी पढ़ी। जिसमें समीरलाल कहते हैं:-

एक पोस्ट पर ढ़ेरों टिप्पणियां मिल जाती है,
पल भर में तुम अपने को महान साहित्यकार समझने लगते हो.
दूसरी ही पोस्ट की सूनी मांग देख आंख भर आती है और तुम सड़क छाप लेखक बन जाते हो.

टिप्पणियों और तारीफों का ख्याल दिल से निकाल दो,
बस अच्छा लिखते जाओ… फिर देखो-
तुम चिट्ठाजगत के हो और यह चिट्ठाजगत तुम्हारा है.


यह सरलता से मौज लेने का अंदाज समीर भाई की खाशियत है। उन्मुक्तजी ने पंत-बच्चन विवाद की आखिरी पोस्ट लिखी। अपने विचार बताते हुये उन्होंने लिखा:-

मैंने इस विवाद के बारे में संक्षेप में लिखा। इस भाग में, इस विवाद के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। जिसे न मैं उचित समझता हूं, न ही उसका इससे अधिक जिक्र करना – पढ़ने के बाद दुख हुआ। शायद बड़ा व्यक्ति होने के लिये केवल बड़ा साहित्यकार होना जरूरी नहीं, इसके लिये कुछ और होना चाहिये।


चलते-चलते आप रतलामी के द्वारा पेश किये गये आज के देशी कार्टून देख लें और महाभारत कथा में जी के अवधिया जी के माध्यम से द्रौपदी स्वयंवर की कथा सुन लें।
दफिलहाल चिट्ठाचर्चा में इतना ही। आगे की चर्चा अतुल करेंगे अगर पिछली बार की तरह व्यस्त नहीं रहे। इसके बाद देबाशीष और जीतू इस साल की चर्चा करेंगे। बेंगाणी बन्धु भी साल के जाते-जाते कुछ लिखेंगे ही। यह बात तुषार जोशी जी से भी कह सकता हूं।

आज की टिप्पणी:-

1.गीता की नवीनतम व्‍याख्‍या के लिये श्री श्री श्री 007 समीर लाल जी महाराज के चरणो मे उनके भक्‍त श्री 420 प्रमेन्‍द्रानन्‍द के द्वारा उनके चरण कमलो मे उनके ज्ञान द्वारा एक तुच्‍छ व्‍यायाख्‍या……..

तुम क्‍यो खडे हो किसके लिये खड़े हो।
यहॉं तुम्‍हारा कौन है। कभी खुद से चिन्‍तन किया कि कभी किसी को टिप्‍पणी की नही दूसरे से क्‍या अपेक्षा रखते है। कभी अपने घर का वोट पाया है, क्या तुम्‍हारी बात को तुम्‍हारे सगे सम्‍बन्धियों ने तुम्‍हारा सर्मथन किया है तो बीच बाजार आ कर वोट मागने खडे हो गये हो। अपने आप को देखो तुम्‍हे नही लगता कि अपनी कविताओं को सुना कर तुमने कितने अनगिनत पाप किये है। कितने अबोध विद्याथियों का श्राप (अपना तो लिख गये, और हमारे सिर पर मढ गये)तुम्‍हारे सिर उठाये हुये हो, उनके मुँह से निकली एक एक आह तुम्‍हे चैन से नही मरने देगी।
प्रेमेन्द्र

२.इस ‘चिट्ठा-गीता’ ने मन के दर्पण पर जम रही सारी धूल पौंछ डाली . प्रवचन से समझ पाया कि यह ‘चिट्ठा-जगत’ आभासी है और ‘चिट्ठा-जीवन’ नश्वर . अपने चिट्ठे के प्रति माया-मोह के सारे बंधन कट गये . अब ज्ञान की मुक्तावस्था में विचरण कर रहा हूं . गुरु उड़नस्वामी को प्रणाम!
प्रियंकर

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7 Responses to सफाई का काम एक कला है

  1. Udan Tashtari कहते हैं:

    साल खत्म होने के पहले बहुते चिंतनशील हो गये और बड़ी गहरी बातें बता गये. आप धन्य हैं. 🙂

  2. Pankaj Bengani कहते हैं:

    ब्रह्ममुहुर्त पर गुरूज्ञान का मिलना सौभाग्य है, द्रोण चाचु

  3. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    तमाम तरह के जाँचक भी प्रविष्टीयों का शुद्धीकरण करने में असफल रहे हैं, पुरी कोशिश(पहले कोशीष लिखता था) रहेगी की नए साल में मैं अशुद्धी रहित हिन्दी लिखुँगा.

  4. श्रीश । ई-पंडित कहते हैं:

    “लेकिन मुझे लगता है विविधता इस चर्चा की खाशियत है और इसे बने रहने चाहिये।”सोलह आने सच बात है जी। विविधता से रोचकता बनी रहती है।“लेकिन कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि इस शानदार अंदाज में पोस्ट जिसका किया जा रहा है वह गौड़ सी हो जाती है।”ऐसी तो कोई बात नहीं है। जिन पोस्ट का लिंक दिया सभी पर हम जाते ही हैं।“इसलिये यह अच्छा रहेगा जब आप अपनी कोई पोस्ट लिखें तब अपने ड्राफ्ट को फाइनल करके नयी पोस्ट में ही डालें!ड्राफ़्ट को ही प्रकाशित करने से पोस्ट पुरानी पोस्टों में चली जायेगी।“इसकी बजाय ड्राफ्ट को प्रकाशित करते समय Time Stamp बदल दें। मैं ‘विंडोज लाइव राइटर’ द्वारा लिखता हूँ और पब्लिश करते समय ड्राफ्ट का समय बदलकर वर्तमान कर देता हूँ। मेरे विचार से यह सुविधा सभी ब्लॉग-सर्विसों में होगी।“चर्चा के लिये चिट्ठे न होने की बात भी पर भी मुझे यह लगता है कि अगर चर्चा के लिये पर्याप्त पोस्ट नहीं हैं तो अगर ठीक समझें तो उस पोस्ट की चर्चा विस्तार से की जा सकती है जिसे किसी चर्चा में अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाया या किसी कारण वश वह छूट गयी।”हाँ इस बात से तो मैं भी सहमत हूँ।

  5. reeteshgupta कहते हैं:

    सही कहा है आपने ।भाव स्पष्ट करने के लिये शब्दों में कुछ बदलाव किया है ।धन्यवाद !!रीतेश गुप्ता

  6. ढल रहे वर्ष की आखिरी पोस्ट येइक नये वर्ष की राह दीपित रखेआपका ये कलम-ध्वज गगन को छुएंव्यंग पल पल चलें साथ बन कर सखेस्याही की बून्द में छिप रहे तंज केपंछियों के मिले पूर्ण विस्तॄत गगनआपके चिट्ठे पर सब करेम टिप्पणीआपके द्वार आ हर ब्लागर रुके

  7. mahashakti कहते हैं:

    श्री अनूप जी, सर्वप्रथम धन्‍यवाद की आपने मेरी टिप्‍पणी के चर्चा के लायक समझा, अन्‍यथा मुझे लगता था कि मै केवल विवादस्‍पद टिप्‍पणी ही करता हूँ। @ श्रीश जी मै भी आपसे सहमत हूँ कि चिठ्ठों के आभाव जो चिठठे कभी चर्चा के लिये छूट जाते है। उनका प्रयोग कर लेना चाहिये। जैसे मेरे अदिति के चिठ्ठे की चर्चा नही हुई थी। वैसे यह चर्चाकार पर निर्भर करता है वह किन चिठ्ठो की चर्चा करे। वैसे मै एक सुझाव देना चाहुगा कि जो चिठ्ठे चर्चा लायक या चर्चा के विषय के अनुरूप न हो उन्‍हे अलग से उसी चर्चा मे अन्‍य उल्‍लेखीय चिठ्ठे के नाम से दिया जा सकता है।

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