विकास के यह रंग

आज ऐसा लगता है सब आराम करने में जुटे हैं। जिसे आराम करना चाहिये था वो बस काम करते दिखे। हमारे काव्यात्मक चिट्ठाचर्चक राकेश खंडेलवाल जी अपनी शादी की २५वीं वर्षगांठ मनाकर छुट्टी से लौट आये हैं और आते ही सप्तपद के वचन सुना रहे हैं:

चाँद तारे उतर द्वार पर आ गये
चांदनी आई ढोलक बजाने लगी
फूल की पांखुरी में भरे ओस को
नभ की गंगा भी कुछ गुनगुनाने लगी
पारिजातों को ले साथ निशिगन्ध ने
गूंथे जूही के गजरे में कुछ मोगरे
शतदलों ने गुलाबों के भुजपाश में
प्रीत की अर्चना के कलश आ भरे

पूर्णिमा से टपकने शहद लग पड़ा
और गंधर्व खुशियाँ लुटाने लगे
रात घूँघट को अपने हटाने लगी
फिर से संकल्प सब याद आने लगे…….

बहुत सुंदरता से रची गयी यह दिल की आवाज अवश्य पढ़ें.

आराम करने के मूड़ में अपनी बेबाक लेखनी के लिये चर्चित जगदीश भाटिया जी दिखे क्योंकि एक छोटी सी पोस्ट के माध्यम से वो दिल्ली के विकास को आईना दिखा गये।

गीता के अध्याय २ के श्लोक ५-६ को अर्थ के साथ लेकर हाजिर हैं रा.च.मिश्र जी. मिश्र जी के इस सार्थक और साहसिक प्रयास को साधुवाद और शुभकामनायें.

हृदय रोगियों के लिये रेल्वे द्वारा प्रद्धत डाईट मील की सुविधाओं का लेखा जोखा पेश कर रहीं हैं मनीषा जी. हालांकि अभी यह शताब्दी और राजधानी ट्रेनों तक सिमित है, मगर एक अच्छी शुरुवात है.

मानसी अपने संगीत के सफर की गाथा सुना रही हैं, आप भी सुनें:

संगीत सीखना मेरी मां ने शुरु करवाया था मुझे। शौक तो था मुझे संगीत का, मगर सीखने जाना, रोज़ टीचर के पास…किस बच्चे को पसंद होगा। तब मैं ७-८ साल की थी जब संगीत की शिक्षा शुरु हुई। श्रीमति जयश्री चक्रवर्ती से। वहाँ वैसे सप्ताह में २ बार ही जाना होता था। मैं जाती थी भैया के साथ, साइकिल पर। और हर बार जाकर वही वही अलंकार, एक जैसा, अभ्यास करो, अभ्यास से ही गले में स्वर बैठेगा..उंहु..। मुझे लगता कि अब तो कोई गाना सीखूँ, भजन आदि। पर नहीं वो मुझे वही सा, रे, ग, की प्रक्टीस…तो खै़र…दो साल मैं उनसे सीखती रही और दो साल बाद उनका तबादला हो गया।

अब चलते हैं, आज जब सब आराम कर रहें हैं, तो हम ही क्यों पीछे रहें, हम भी चलते हैं.

बस चलते चलते मेरी पसंद: (किसने लिखा है, मुझे नहीं मालूम)

जो पूछता है कोई सुर्ख़ क्यूं हैं आज आखें
तो आंख मल के ये कहता हूं रात सो ना सका
हज़ार चाहूं मगर ये ना कह सकूंगा कभी
कि रात रोने की ख्वाहिश थी मगर रो ना सका

आज की तस्वीर:

इस तस्वीर पर चर्चा: आइना पर:

जगदीश भाटिया: आज इस सुअर से बहुत मनुहार किया कि एक बार सिर ऊपर करके अच्छा सा पोज़ दे दे, मगर उसे केवल कूड़े में ही मजा आ रहा था, मेरे ब्लाग के लिये पोज़ देने में उसे जरा भी रुचि नहीं थी।

समीर लाल: आप उसे मंत्री पद का लालच दे देते तो जरुर सिर उठा लेता.

जगदीश भाटिया: ठीक कहा समीर जी!
और फिर अपने ही सचिव की हत्या करने वाले मंत्रियों से बेहतर मंत्री साबित हो सकता है ये बेचारा !

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1 Response to विकास के यह रंग

  1. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    अरे भाई हमारे लिए जलेबी (कुण्डली-मुण्डली) कहाँ है, जिसके लिए हर बुधवर का इंतजर रहता हैं.

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