हालोवीन का असर

फिर मंगल आ गया सामने चर्चा करने आना है
इधर उधर से ढूँढ़ ढांढ कर फोटू भी चिपकाना है
लिखना क्या है सोच सोच कर कलम सरकती हाथॊं से
किसका चिट्ठा छोटा है, किस पर लंबा अफ़साना है

चिट्ठा चर्चा से पहले चर्चाकारों से मिलते हैं
जिनके कारण ही रोजाना चर्चा के गुल खिलते हैं
कितनी मेहनत करते हैं, शब्दों में बांध नहीं पाता
हमको तो पढ़ने में ही लगता है पापड़ बिलते हैं


एक फ़ुरसतिया आख्यान जिसने पढ़ा
वो वहीं का वहीं रह गया फिर खड़ा
टिप्पणी को मचलने लगे सब गणक
कुंजियों के पटल खड़खड़ाने लगे

एच ओ वी लेन में मिल गया था टिकट
थे अकेले तभी, यह समस्या विकट
कोई सहयोगी बन कर चले साथ में
रोज ही अपनी जुगतें भिड़ाने लगे

एक स्पर्श जो कि रतलाम से आ गया
यों लगा पूरे ही जाल पर छा गया
ऐसा है उस छुअन का नशीला असर
जाल पर जा गणक लड़खड़ाने लगे

एक नारद से जो खत पठाता रहा
वो घटाओं सा घिर घिर के छाता रहा
जब से कासिद को जीवन दिया दूसरा
सब ब्लागी कबूतर उड़ाने लगे

एक तरकश है, है इक उड़नतश्तरी
जान पाये न कितनी विधायें भरी
ली कलम हाथ में, कुछ लिखूँ, क्या हुआ
कोष के शब्द सब गड़मड़ाने लगे

जब से भाषाओं के सिलसिले जुड़ गये
कुछ इधर आ गये, कुछ उधर मुड़ गये
एक ये जो कभी बन के पुरवा बहे
तो कभी बन घटा तड़तड़ाने लगे

लम्बी चर्चा में दोषी नहीं मैं तनिक
क्या लिखूंगा न इसकी भनक थी तनिक
कैद होकर जो माऊस की क्लिक में रहे
खूँटे वे शब्द, सब अब तुड़ाने लगे

छुट पुट बतलाते हैं हमको ओपन सोर्स कहां से आया
किसने इस पर काम किया है किसने इससे नाम कमाया
उत्तर भारत क्यों कर फिछड़ा, दक्षिण भारत है जो आगे
अपने चिट्ठे पर बिन उत्तर दिये, प्रश्न यह एक उठाया

रत्ना की रसोई तकनीकी और अधिक कुछ होती जाती
ढूँढ़ ढाँढ़ कर इधर उधर से अब सबको चलचित्र दिखाती
बना बना कविता की गुझिया पहले तो परोस देती हैं
फिर खुद ही उसमें मिस्रण की कितनी हैं कमियां गिनवाती

और रात जो सपना देखा वह मध्यान्ह तलक बाकी था
इसीलिये कुछ नजर न आया, इतनी ज्यादा चढ़ी खुमारी
दूरबीन को लगा लगा कर, जाल, जाल पर फेंके मैने
कोई ऐसा मिला न मुझको जो हो चर्चा का अधिकारी

आज की टिप्पणी:-

और टिप्पणी एक आज की रत्ना की रसोई पर पाई
जो समीर ने लिखी” वाह क्या बात खोज कर लेकर आईं
मजा आ गया, दाद कबूलें, रखें रसोई अपनी चालू
इसी बहाने हम सब खायें नई नई हर रोज मिठाई

वाकई, शायर/कवि साहब का अंदाज़ और आत्मविश्वास देखने लायक है।
क्या बात खोज कर लाईं हैं, इस पर तो आप दाद कबुल करें, मजा आ गया.
ऐसे ही परोसते रहें, सच में, कोई शिकायत नहीं रहेगी.

आज का फोटो:-

भात बाजी से

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2 Responses to हालोवीन का असर

  1. Udan Tashtari कहते हैं:

    मात्र तीन चार चिट्ठे और फिर भी चर्चा पूरी , यह गुर तो आपसे सिखना पड़ेगा, प्रभु. 🙂

  2. अनूप शुक्ला कहते हैं:

    हमारा तो यही कहना है कि अपनी तारीफ़ सुनकर हम फूले न समाये लेकिन लोक-लाज में शर्माने का नाटक करना पड़ा.

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