ये क्या जगह है दोस्तों…

पितर पक्ष समाप्त हुये.नवरात्र की शुरूआत हुयी.रमजान की शुरुआत के साथ रोजे भी शुरू.यह अपने देश का सबसे ज्यादा त्योहारों वाला समय है.एक तरफ गुजरात,दिल्ली,मुंबई और बाकी हिस्सों में डांडिया की धूम है तो दूसरी तरफ़ बंगाल में दुर्गा पूजा की तैयारियां शुरू हो गयीं. रामलीला के मंच भी चहल-पहल में डूबने लगे हैं.रावण के पुतले बनने लगे .कवि सम्मेलन और मुशायरों के दिन आये.ये दिन कवियों और शायरों की सहालग के दिन है. ऐसे ही एक मुशायरे में प्रख्यात शायर राहत इन्दौरी पढ़ रहे थे:-

सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में
किसी के बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अपने आप में खास है.इसके विभिन्न पहलुऒं के बारे में जानकारी दे रहे हैं अरविंद दास:-

विश्वविद्यालय सही मायनों में अखिल भारतीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। केरल से लेकर कश्मीर तक और उत्तर-पूर्व राज्यों से लेकर मध्य भारत के कोने-कोने से यहाँ छात्र शुरूआती दिनों से आते रहे हैं। यह आवासीय परिसर छात्र – छात्राओं को एक-दूसरे को नजदीक से जानने का अवसर देता है। जो कुछ भी भ्रांतियाँ या पूर्वग्रह अन्य जाति या धर्म के प्रति रहते हैं, धीरे-धीरे खत्म होने लगते हैं। अरबी भाषा और साहित्य में शोधरत अताउर रहमान कहते हैं:‘मदरसा से पढ़ने के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया में जब मैंने दाखिला लिया, वहाँ अपनों के बीच ही सिमटा रहा। यहाँ आकर पहली बार दुनिया को दूसरों की नजर से देखा।’

पूरा लेख जे एन यू के विविध पहलुऒं के बारे में बताता है. आशा है कि आगे की पोस्टों में अरविंद जी वहां के छात्र नेताऒं की मन:स्थिति और सोच के बारे में बतायेंगे तथा यह भी कि बिहार में मारे गये जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष चंद्रशेखर को लोग वहां किस तरह याद करते हैं.

अफलातून देसाई जी से भी गुजारिश है कि कुछ बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के बारे में बताते रहें.फिलहाल तो अफलातूनजी परिचर्चा में हो रही हिंदी पर बहस की बातें आपको बता रहे हैं.हिंदी के बारे में अपने विचार जनता जनार्दन को बताते हुये आशीष गुप्ता कहते हैं:-

मैं भाषा के स्वतः विकास का समर्थक हूँ। अगर किसी समय हिन्दी की बजाय अन्य भाषा प्रचलित हो जाती है तो जबरजस्ती हिन्दी पढ़ाने का ना मैं शौकीन हूँ ना यह कारगर तरीका है। भाषा विचारों का माध्यम है और कुछ नही (कम से कम सामान्य लोगों के लिये तो)। मेरे महाविद्यालय में एक समूह संस्कृत भाषा के विस्तार में कटिबद्ध था और गावों में स्थानीय तमिल की जगह संस्कृत का उपयोग प्रचलित करने के प्रयास करता था। मुझे उनके प्रयास समय और साधनो की व्यर्थतता ही लगे। भारतीय भाषायें मूलतः संस्कृत की संतति हैं। कौन माँ चाहेगी कि उसकी कीर्ती के लिये उसकी संतान का हनन किया जाये?

ये आशीष जी के विचार हैं लेकिन लोग बताते हैं कि मामला हिंदी बनाम अंग्रेजी का नहीं है वरन अंग्रेजी बनाम भारतीय भाषाऒं का है. अंग्रेजी यहां लदी हुयी है इसलिये नहीं कि अंग्रेजी का यहां स्वत: विकास हुआ यह साजिशन है जो अभी भी काम-धाम की भाषा यह बनी हुयी है.

बालेंदु शर्मा बता रहे हैं समाचार पत्रों की भेड़चाल के किस्से जो अंग्रेजी मिश्रित हिंदी प्रयोग करनें जुटे पड़े हैं:-

नवभारत में तो इस तरह के प्रयोग कम हो गए हैं लेकिन दूसरे अखबारों ने (जो बड़े अखबारों का अंधानुकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ते), इसे अपना लिया है। इनमें से कुछ तो अपने लेखों और खबरों में इतनी अंग्रेजी (कहीं देवनागरी लिपि में तो कहीं रोमन में भी) का प्रयोग कर रहे हैं कि लगता है भाषा के भ्रष्ट होने की यही गति जारी रही तो कुछ साल में ये अखबार देवनागरी लिपि में छपे अंग्रेजी अखबार बन कर न रह जाएं।

रमजान का महीना शुरू हुआ और शारजाह दुल्हन की तरह सज गया लेकिन शुऐब उसका मकसद भी बताते हैं:-

हर वर्ष दुबई मे शॉपिंग फेसटिवल मनाया जाता है और शारजाह मे रमज़ान का फेसटिवल मनाने की रिवायत है मानो मुखतलिफ फेसटिवलों को इस देश के सात राष्ट्रों ने आपस मे बांट रखा है। कोई भी फेसटिवल हो मकसद एक ही है पैसा कमाना और दबा कर कमाना।

ये मौसम ही कुछ ऐसा है कि मच्छर तक मस्त हैं और आपस में गपिया रहे हैं जिसको सुनकर बता रही हैं शिल्पा अग्रवाल:-

एक नुकीली मूँछ वाले सुडौल मच्छर का स्वर हमार कानों से टकराया- ” हम जिन शर्मा जी के यहां आज कल डेरा जमाये हुए हैं, उनके केबल आपरेटर ने उन्हें अपनी सेवाएँ देना बंद कर दिया है| अब बिना अबतक और सीन्यूज़ की खबरों के हमारा जी वहाँ नहीं लगता है| अब सोच रहे हैं कि मुनिसिपल कार्पोरेशन के बाजू वाली गली के गुप्ताजी के यहाँ पलायन कर लिया जाए| वहाँ की सङक पर काफी पानी रहता है, इससे मुझे बहुत आराम होगा|अरे भैया, तुम्ही बताओ कि कल के विशेष बुलेटिन में क्या मसाला था|”

इधर भारत क्रिकेट में हारा नहीं कि सवाल उठने लगे कि जब यही हाल होना है तो बेचारे गांगुली क्या बुरे हैं. आप इस बात पर सोचें तब तक लफ्जों के जादूगर साहिर लुधियानवी के बारे में भी जान लें और यह भी कि आर.एस.एस. क्या बला है.

सुनील दीपक के मछेरे का चित्र देखकर याद आती है कविता:-

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछ्ली में बंधन की चाह हो.

रवि रतलामी से जानिये वोट बैंक का चक्कर और सुनते रहिये चुटकुले.इसके बाद आइये बताते हैं कि विवाह के लिये इंटरव्यू कैसे होता है.पहले जानिये उसकी अहमियत मनीष के से:-

अब इस इंटरव्यू को सिविल सर्विस की प्रतियोगिता परीक्षा से कम तो नही पर समकक्ष जरूर आँकना चाहिए । देखिये ना कितनी समानता है वहाँ पूरी परीक्षा तीन चरणों में होती है तो यहाँ साक्षात्कार ही तीन चरणों में होता है (पहले वर के पिता और उनके करीबी, फिर अगले चरण में घर की महिलायें और और अंतिम चरण में दूल्हे राजा खुद) अब इस परीक्षा के परिणाम की जिंदगी की दशा और दिशा संवारने में कितनी अहमियत है ये तो हम सभी जानते हैं।

आगे मनीष का संकल्प है:-

अरेन्जड मैरिज के लिये ये सारे प्रकरण जरूरी हैं, इस बात से मुझे इनकार नहीं । पर ये सारा काम एक सहज वातावरण में हो तो कितना अच्छा हो । पर सहजता आए तो कैसे खासकर तब जब पलड़ा हमेशा वर पक्ष का ही भारी रहता हो। कम से कम इन अनुभवों से मैंने यही निश्चय किया था कि अपनी शादी के समय इन बातों का ध्यान रखूँगा ।

अपने आगे के अनुभव वे आगे बतायेंगे. लेकिन इधर फुरसतिया अपने पुराने हाट-बाजार के अनुभव सुनाने लगे:-

चल पड़े बेचारे वह मंदिर पैदल,
साथ उनके था पैदलों का एक दल।
पगडण्डी पर चलने की आदत नहीं थी
पर संभलकर चलने की फुर्सत कहां थी।।

कर गये जल्दी संभल न पाये एक पल,
ढाल पर फिसलकर तोड़ लिये चप्पल।
चप्पल उठाने में चश्मा गिराये,
फिर उस चश्में से कभी न देख पाये।।


आज की टिप्पणी:-

अपने मक़सद में सफल रहे आप
हम सच में झिल गये माई-बाप ।

निधि


आज की फोटो:-

आज की फोटो बालेंदु शर्मा के वाह मीडियाब्लाग से

हिंदी अखबार की हिंदी
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