Monthly Archives: अक्टूबर 2005

हवाएँ राह चलते भी हमें पहचाने लेती हैं

लोग पूजा कर रहे हैं लताजी की परेशान हैं देबाशीष। खेलों की देशभक्ति के विकेंद्रीकरण के बारे में भी विचार करते को कहते हैं। पड़ोसी के दुख को महसूसते हुये सुनील दीपक का ऐसा कहना है कि दुनिया सिमट रही … पढना जारी रखे

Uncategorized में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

उई माँ!

वैसे इस मलयालम फोटोब्लॉग प्राणीलोकम के कीड़े इतने डरावने भी नहीं। मज़ा नहीं आया, लगता है आप विंडोज़ एक्सपी के बिहारी संस्करण का प्रयोग नहीं कर रहे?

Uncategorized में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

क्या यही प्यार है?

बचपन में “उठो लाल अब आंखे खोलो” कविता सुनकर जागने की आदत बना चुके स्वामीजी अब परेशान हैं अलार्म घड़ी की आवाजों से। अतुल कुछ तरीके बता रहे हैं दुल्हिन को बस में रखने के। हिंदिनी पर अपनी पोस्टों का … पढना जारी रखे

Uncategorized में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे