मित्र तुम कितने भले हो!

हिंदी चिट्ठाजगत दिन-प्रतिदिन समृद्ध हो रहा है। इस बीच हिंदी चिट्ठाजगत में निम्नलिखित नये चिट्ठे जुड़े –

सभी चिट्ठाकारों का हिंदी चिट्ठा जगत में हार्दिक स्वागत है। आशा है इन चिट्ठाकारों को नियमित रूप से अपने विचार प्रकट करने का पर्याप्त समय मिलेगा जो कि हिंदी चिट्ठाजगत को समृद्ध करेगा।

चर्चा की शुरुआत अक्षरग्राम से। दसवीं अनुगूँज का विषय था – चिट्ठी। आयोजक रवि रतलामी ने बड़ी खूबसूरती से अवलोकनी चिट्ठा लिखा। ग्याहरवी अनुगूँज का विषय दिया गया है – माजरा क्या है? खबर लिखे जाने तक केवल चार लोगों ने पोस्ट लिखी थी। अक्षरग्राम पर दूसरी प्रमुख खबर रही हिंदी के पहले चिट्ठाकार सम्मेलन की खबर। अतुल-रमणकौल मिलन के साथ-साथ स्वामीजी के साथ टेलीसम्मेलन हुआ। बाद में इसकी खबर इधर-उधर भी छपी। भारत सरकार द्वारा हिंदी के फॉण्ट जारी करने की खबर भी मुख्य आकर्षण रही ।

सारिका सक्सेना ने अनकही बातें कहनी शुरु की। परिचय दिया – दो कविताओं के बाद। अपने बारे में लिखने के बाद मित्र को याद किया :

तुम वो नहीं जो साथ छोड़ो;
या मुश्किलों में मुंह को मोड़ो।
राह के हर मील पर तुम,
निर्देश से बनकर खड़े हो।
मित्र तुम कितने भले हो!

रमन को लगता है कि अप्रेजल के बाद कुछ अर्थलाभ हुआ है तभी ये बंटी और बबली देख के आये तथा बताये कि कुल मिला के सब कुछ बहुतै बढ़िया… एकदम टोटल टाईमपास

शैल ने नाटक होने की सूचना तो दी लेकिन यह नहीं बताया कि नाटक कैसा हुआ था। “माजरा क्या है?” पर लेख भी लिखा।

रमण कौल ने अपना अड्डा बदला तो उन्हें दिखे तूफान के बच्चे तो ये भाग के पहुंचे अतुल के पास मुलाकात करने के लिये। वहीं बात भी हुई स्वामीजी से। अमेरिकी जीवन में सामाजिक सुरक्षा नंबर की क्या अहमियत होती है यह रमण बताते हैं।

स्वामी जी ने इजाद किया है हग दो। क्रांतिकारी अविष्कार है यह हिंदी चिठ्ठाकारी के लिए। लगता है जल्द ही सारे वर्डप्रेस से चलने वाले चिठ्ठो पर अब टिप्पणियाँ काट के नही चिपकानी पड़ेंगी। स्वामीजी कहानी लिखते भले न हों पर समझ काफी रखते हैं यह बताया इन्होंने चिट्ठी कहानी की समीक्षा करके । अनुगूँज पर स्वामीजी ने सारगर्भित लेख लिखे

धनंजय शर्मा ने अपना परिचय देते हुये कविता-प्रतिकविता लिखी।

गुरु गोविंद में माँ पर लंबी कविता पढ़ने को मिली।

रवि रतलामी से ज्ञानवर्धक यशोगान सुनिए ऑपेरा का। सुर मिलाएँ ऑपेरा के साथ। चौंकिए नही अपने रवि भाई ऑपेरा ब्राऊजर की बात कर रहे हैं, उस नाट्य कला की नही जिसका मजाक दिल चाहता है में आमिर खान ने उड़ाया था।

ज्ञान-विज्ञान में हरीश अग्रवाल का विज्ञान से जुड़ा एक लंबा लेख छपा। प्राचीन विज्ञान के बारे में बताने के बाद यह जानकारी कि प्रेट्रोल के संभावित विकल्प की जानकारी दी गई।

एक धुँआधार लेखक हैं तरूण। थोड़ा सा गड़बड़झाला हो गया वरना बुनो कहानी की कड़ी इन्होने अच्छी बढायी थी। खैर अगली कहानी शायद तरूण ही शुरू करें। वैसे तब आप कुमाउंनी होली के रंग देखिए।

देवाशीष ने काफी दिन बाद लिखना शुरु किया तो शुरुआत में ही चापलूसी की हद कर दी। सृजनात्तमकता और गुणता नियंत्रण में बताया “जब आत्ममुग्धता सृजनात्मकता पर हावी हो जाये तो गुणवत्ता की तो वाट लगनी ही है”। परिवारवाद चलाने के लिये इमेज बिल्डिंग की प्रकिया की जानकारी भी मुहैय्या कराई।

प्रत्यक्षा सिन्हा को मौन की बोली अच्छी लगती है जो उन्हें भीने लम्हों तक पहुँचाती है –

तुम्हारे खत में ताज़ा है अभी भी प्यार की खुशबू
इन भीने लम्हों से अब भी कहाँ बोलो रिहाई है

तथा उनकाहृदय भर आता है –

लिया जब नाम प्रियतम का
हृदय कुछ और भर आया

राजेश ने कल्पवृक्ष के अलावा छाया ब्लाग शुरु किया ।शायद वह गद्य-पद्य के लिये अलग-अलग ब्लाग रखना चाहते हैं। शुरुआत में बंदरलैम्पंग का विवरण दिया है –

इस शहर में, हर शख्‍स, हमसे अन्‍जान क्‍यों है ?

कुत्ते चले फिल्म की ओर लिखकर न जाने कहाँ चले गये विपिन श्रीवास्तव।

बुनो कहानी एक बार फिर कनपुरिया कहानी हो गयी। पहला भाग लिखा अतुल ने दूसरा गोविंद उपाध्याय ने। अब यह तय नहीं हो पा रहा है कि कहानी खत्म हो गयी या अभी तीसरा भाग लिखेगा कोई!

“फ्रैंच फ़ैशन ग्रुप मिनैली” कम्पनी श्री राम के चित्र को जूतों पर अंकित कर बाज़ार में बेच रहा है।

यह समाचार महावीर शर्मा ने बताया तथा पूछा – क्या हम चुप रहें? अन्ततोगत्वा फ्रैंच कम्पनी ‘मिनैली’ ने अपने जूतों की बिक्री पर रोक लगा दी। “माजरा क्या है” के अंतर्गत महावीर शर्मा ने दूसरी पोस्ट भी लिख दी – जाने अजाने गीत के बाद ।

कोशल अधिक दिन टिक नहीं सकता
कोशल में विचारों की कमी है।

श्रीकांत वर्मा की कविताओं से अपने ब्लाग लेखन की शुरुआत करने वाले मनोजने अभी तक दूसरों के उद्धरण देकर अपनी सोच को साफ करने की शुरुआत की है। आशा है आगे कुछ मामला और साफ होगा।

मानसी की प्रेम की व्यथा किसी के आने पर खतम हो गयी और रोशनी दिखी उन्हें –

तेरे आने से ज़िन्दगी देखी
अंधेरों में कहीं रोशनी देखी

अनूप भार्गव अपने सबसे पसंदीदा शेर से बात शुरु करते हैं –

कल रात एक अनहोनी बात हो गई
मैं तो जागता रहा खुद रात सो गई ।

फिर वे गीतिका लिखते हैं –

परिधि के उस पार देखो
इक नया विस्तार देखो ।

तूलिकायें हाथ में हैं
चित्र का आकार देखो ।

परिधि तथा केन्द्र से कुछ ज्यादा ही लगाव है अनूप भार्गव को यह इनकी कविताओं से लगता है।

शशि सिंह पर्दे पर कश की कशमकश की बात करते हुये, विक्षिप्त वर्तमान की बात करते हुये बताते हैं कि कानून आम तथा खास के लिये कैसे अलग है।

आशीष आजकल काफी लिख-पढ़ रहे हैं। श्रद्धा के पात्र बाबू में वे लिखते हैं:-

ज़्यादातर दफ़्तरी बाबुओं का नाम सुनकर डर सा ही लगता है या फिर एक चिढ़ सी होती है और किसी भ्रष्ट बाबू का चेहरा सामने आ जाता है। लेकिन महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के गरीब स्कूली बच्चों के लिये ये बाबू किसी देवदूत के समान हैं जो कि उन बच्चों की हर संभव मदद करते हैं। इसके लिये बाबुओं ने एक संस्था भी बनाई है जिसका नाम है ‘लांजा राजापुर संघमेश्वर तालुका उत्कर्ष मण्डल ‘।

राष्ट्रीय स्मारकों के साथ हम कैसा सलूक करते हैं यह भी बताते हैं आशीष। शैम्पू की उत्पत्ति के बारे में सुने । उपेन्द्र प्रसाद के सौजन्य से फान्ट समस्या पर भी विचार किया गया।

“जिंदगी जिंदादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं” के बुलंद नारे तथा “अगर आज नहीं तो कल हमारा होगा के विश्वास के साथ” खाली-पीली की सुनाने के लिये आ गये आशीष कुमार श्रीवास्तव तथा शुरुआत की अपनी बचपन की यादों से।

जो न कह सके वह कहने के लिये सुनील दीपक ने शुरुआत की है। सुंदर नियमित चित्रमय चिट्ठे देखकर यह आशा जगती है कि जल्द ही हिंदी चिट्ठाजगत में नियमित न लिखने का रोना खत्म हो जायेगा। सुनील अंग्रेजी में अरे क्या बात है? तथा इतालवी में आवारगी नाम से भी ब्लाग लिखते हैं।

ब्लाग एक्सप्रेस के प्लेटफार्म पर स्वतंत्रता का जश्न चल रहा है। शेरो शायरी, नेट मटरगश्ती से लेकर भिखारियों की गिनती तक सब हो रहा है पर न जाने क्यों मिर्जा, छुट्टन, शर्माजी, कल्लू पहलवान इत्यादि के किस्से गायब है। जीतू भाई ने कई वायदे कर रखे हैं जिनमे अपनी जीवनी, बारात के किस्से और न जाने क्या क्या सुनाना शामिल है। इन आश्वासनो मे हर बार पुछल्ला लगा रहता था कि “कभी समय मिलने पर लिखूँगा।” अब मिल गया है तो देर किस बात की?

रति जी ने चप्पलों के नाम एक अत्यंत खूबसूरत ऋचा लिखी है। इसको पढ़कर लगता है कि चप्पलें वह तोता हैं जिसमें उनकी जान बसती है:-

चप्पले मेरा व्यक्तित्व हैं, चप्पलें मेरा वजूद हैं
चप्पलें मेरी ऊँचाईँ हैं जिसकी सीढ़ी से मैं आसमान छू सकती हूँ
चप्पले मेरा वर्तमान और भविष्य है।
चप्पले मेरे परिधान की खूबसूरती हैं।
एक जेवर कम हुआ तो कोई ध्यान नहीं देगा किंतु
चप्पल की एड़ी टूटी हो तो सारी दुनिया की नजर गढ़ जाएगी

लालू खिलौना, नरेन्द्र चंचल के बाद अतुलने लिखा माजरा क्या है?

भूखी डाँस बार बालाऐं मचाती गुहार
हवलदार फाड़े सबकी सलवार
कान मे डाल के तेल है बैठी
जनता की सरकार
भईये आखिर माजरा क्या है?

कहीं गुड़िया कहीं इमराना कहीं भँवरी कहीं अनारा
कठमुल्लों की अदालतो के चैनल कराते दीदार
भईये आखिर माजरा क्या है?

सूखी धरती सिकुड़े दरिया खाली बाल्टी सूनी नजरिया
फिर भी मल्टीप्लेक्स में बहती पेप्सी की धार
भईये आखिर माजरा क्या है?

अतुल श्रीवास्तव भगवान को उलाहना देते हैं।

समाजवाद नाम से अमरसिंहजी ने अपने व्यक्तिगत विचारों के सम्प्रेषण के लिये चिट्ठा शुरु किया है। समय बतायेगा कि कितने ईमानदार रहते हैं प्रयास व्यक्तिगत विचार प्रकट करने के। सेवाभाव मे जनसेवकों की मनोवृत्ति का खुलासा करते हैं तथा मियांदाद के दाऊद से संभावित संबंध पर अपनी राय रखते हैं।

डा जगदीश व्योम आजकल सरल चेतना के निर्माण में लगे है तो भाई लोग स्वर्ग-दर्शन में लगे हैं।

हनुमानजी खुश(!) होकर बता रहे हैं – साला मैं तो साहब बन गया।

फुरसतिया में कहानी के आगे की कहानी की बात की गयी।

गुगल की छोटी सी गफलत ने कैसे दो कुट्टियों को मिलाया, बताते है वर्नम। इधर वर्नम ने कम्युनिस्टो की खूब खबर ली है। काटो , चिपकाओ और भूल जाओ
चुग्स जो प्रति शनिवार रोचक कड़ियाँ अपने ब्लाग पर छापते हैं, अखबारो की कटिंग चाय परोसने वालो की खबर ले रहे हैं। जब कि पैट्रिक्स खुद चुग्स की खबर ले रहे हैं यह बताते हुए कि सारे चिठ्ठाकार खबरचोर नही।

मशहूर अखबार हिंदू ने चिठ्ठाकार सम्लेलन की रिपोर्ट छापी है।

क्रिकेट के शौकीनो के लिए खुशखबरी। रेडिफ के मशहूर क्रिकेट लेखक प्रेम पनिक्कर का चौथा अँपायर मैदान में आ गया है।

अमित वर्मा अंग्रेजी के धुंआधार लिखने वाले चिट्ठाकारों में है। कुछ दिन पहले रोहित पिंटो की दुकान बंद करा चुके हैं। अब लोग अमित वर्मा की पोल खोलने में लगे हैं। इस काम के लिये बाकायदा लोगों का सहयोग मांगा गया है। कुछ लफड़ा तो इस बात का है कि अमित ने अपनी खुली बुराई सुनने के सारे रास्ते बंद कर दिये हैं। जबकि दूसरे चिट्ठाकार अपने ब्लाग पर टिप्पणी स्वीकार करते हैं वहीं अमित ने आलोचना का रास्ता बंद कर रखा है। जो हो यह ब्लाग नहा धोकर अमित वर्मा के पीछे पढ़ा है और अमित हैं कि बोलते नहीं।

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