बांगड़ू कोलाज और चाबुक की छाया

खबर लिखे जाने तक हिंदी ब्लॉग जगत में निम्नलिखित नये चिट्ठे जुड़े हैं

सभी नये साथियों का स्वागत है हिंदी चिट्ठा संसार में। आशा है कि इन साथियों का लिखना जारी रहेगा। चिट्ठों की बात करें तो यह प्रतीत होता है कि लिखने की तीव्रता में कुछ कमी सी आयी है। जो लोग लिख रहे हैं उन पर टिप्पणियों की मात्रा भी कम हुयी है। शायद लोगों की अपेक्षायें बढ़ी हैं तथा अब हर प्रविष्टि पर वाह-वाह करने की आदत लोगों ने कम कर दी है।

बहरहाल चिट्ठों के माहवार सफ़रनामे की शुरुआत चौपाल की बात से। अक्षरग्राम में अनुनाद ने नवीं अनुगूंज के विषय “आशा ही जीवन है” का अवलोकनी चिट्ठा सविस्तार लिखा। दसवीं अनुगूंज के लिये रवि रतलामी ने विषय दिया है –चिट्ठी। चिट्ठी पर चिट्ठाकारों की कलम का जादू बिखरना शुरु हो गया है। अगर आप इसे पढ़ रहे हों तो चूकें मत तथा लिख डालें पत्र अपने ब्लॉग पर। अक्षरग्राम पर ही देवनागरी की विशिष्टता बताते हुये दो लेख अनुनाद ने लिखे हैं। मधु किश्वर के दो लेखों का जिक्र विनय ने किया। दोनों ही लेख पठनीय है। जीतेन्द्र ने सूचना दी कि सन्तों और विद्वानों की सूक्तियां संग्रहीत की हैं उन्होंने। वे चाहते हैं कि और सभी लोग इस परियोजना का लाभ ले सकें।

पाकिस्तानी उलेमाओं ने फतवा जारी किया कि किसी इस्लामी देश मे सार्वजनिक स्थलों पर हमला इस्लाम की नज़र में हराम है। इस फतवे की विसंगतियों पर नज़र डाली रमण कौल ने, जिनके चिट्ठे के नये कलेवर पर ऐश्वर्या राय की दिलकश फोटो बस देखते ही रह जाने का मन करता है। (अनूप भाई, ये पंक्तियां भाभी जी तक पहुंचने न दें, कहीं आपकी शामत न आ जायेः सं०)

स्वामीजी खुन्नस निकालते हैं उन पत्रकारों पर जो भारत की छोटी-छोटी उपलब्धियों से खुश होकर देश की प्रगति का ढोल पीटने लगते हैं। वे आगे कहते हैं-

काश कोई पत्रकार ऐसा कुछ लिखे, ”अगर हर देसी, लालू और जयललिता समेत, इमानदार, मेहनती और सुपर बुद्धिमान हो जावे तो भी कम से कम १०० बरस लगेंगे इस उजडे चमन का हुलिया सुधारने के लिए और अमेरिका जैसे देशों (तथा) पाकिस्तान, चीन जैसे पडोसियों के चलते ये डेडलाईन भी मीट नही होगी! ”

स्वामीजी, जो कौम ईमानदार, मेहनती तथा बुद्घिमान होती है उसके लिये समय के पैमाने भी दूसरे होते हैं। १०० साल की फाइल को वो १० सालों में ‘जिप’ कर सकती है। वैसे स्वामीजी ने घरफूंक तमाशा देखने का शौक भी पाल लिया है। फिर बताया कि मुफ्त की सेवायें प्रदान करने वाली कंपनियां अब साथ में विज्ञापन का कचरा भी देंगी – मुफ्त में, दान के बछड़े के दांत नहीं गिना करते भई!

कविता सागर में मुनीश ने कुछ कालजयी कवितायें और प्रकाशित कीं। रवि ने हिंदी लिनक्स की कहानी बतायी। बाल विवाह रोकने के लिये सामाजिक उदासीनता का जिक्र भी किया। बाद में यह खबर मिली कि एक महिला अधिकारी ने बाल विवाह के खिलाफ लोगों में जागरुकता पैदा करने की कोशिश की तो लोगों ने उसके हाथ काट डाले। समाचार पत्र खबर को प्रकाशित करने की कर्तव्य पूर्ति करके बाकी जगह कैसे सहवाग का गिरेबां राइट ने पकड़ लिया था, इसकी जानकारी देने में मशगूल हो गये। यही पत्रकारिता है बॉस, हम चिट्ठाकार बस यूँ ही भले।

अपने जापानी मत्सु भाई भी बी.ए. हो गये और लगे कहानी सुनाने छुट्टियों की। पर्यावरण के खतरों से आगाह करते हुये आशीष आंख के इलाज की जानकारी देते हैं। इंग्लैंड के लोगों के व्यवहार के बारे में आशीष का कहना है कि रस्सी जल गई ऐंठ नहीं गई। साथ ही प्रधानमंत्री जी को खुला पत्र लिखकर देश के विकास के सूत्र सुझाये।

अगर कम्प्यूटर का अविष्कार कालिदास के समय हो जाता तो शायद हमें मेघदूत जैसा काव्यग्रंथ न मिलता कुछ यही कहना है विजय ठाकुर का जो भारत आने की खुशी में एक के बाद एक लगातार तीन किस्से सुना गये मकान के बारे में ।

इस महीने सबसे ज्यादा सक्रियता से लिखने वालों में एक रहे तरुण। उन्होंने निठल्ले चिंतन की जन्मकथाबताई। अंदाज बरकरार रखते हुये उन्होंने अनुगूंज के लिये पाती लिखी प्रिटी वूमेन के नाम
। फिर बन गये मुंगेरीलाल। मुंगेरीलाल ने जहां हसीन सपने देखने शुरु किये वहां दौड़ा लिया पुलिस ने। फिर तो इन्हें हर कोई चोर नजर आने लगा। “शराबी” नामक फिल्म में अमिताभ बच्चन का किरदार नायिका के बारे में कहता है कि उसके एक इस आंख से आंसू एक उस आंख से। हर एक की कीमत लाख-लाख रुपये। भावुक नाटकीय दृश्य देखते हुये ऐसे ही लखटकिया आंसू निरंतर गिरते हैं देबाशीष की आंखों से, तब भी इनकी आंखें देख ही लेती हैं जेनरिक गोरखधंधा। नेपाल से सालोक्य पशुपतिनाथ मंदिर में चंदे के गोलमाल होने की जानकारी दे रहे हैं।

नई हस्ताक्षर प्रत्यक्षा अपने चिट्ठे की शुरुआत आशा जगाती है। इसके पहले वे खुशी को कुछ यूं परिभाषित करती हैं-

खुशी एक ऐसी सफेद चादर है
जिसे ओढ़ते ही
मैं अदृश्य हो जाती हूँ
उन तमाम ग़मों से
जो घात लगाये बैठे हैं
दबोच लेने को मुझे
अपने खूँखार पंजों में।

२५ मई को तेईस साल पूर्ण करने वाली मिकेला दानली अपने परिवार, भविष्य योजना तथा अपनी चाची बनने की ख़्वाहिश के बारे में बताती हैं। प्रतीक श्रीवास्तव ने लिखना शुरु किया और जूझने लगे उस सवाल से जिससे हर शुरुआती ब्लॉगर जूझता है – क्या लिखूं? महावीर शर्मा की यादों के नगमें शुरु हुये तो पिता ने भावुक तथा प्रेरक पत्र भेजा पुत्री को। इसी श्रृंखला मेंससुराल से भी चिट्ठी आती है तथा अंतत: ससुराल ले जाती है।

भगवान को किस रूप में देखती हैं मानसी, जानें। सपनों की व्याख्या के लिये परेशान जीतेन्द्र कंडोम के जुगाड़ू इस्तेमाल में लग गये। उन्होंने उमेश शर्मा की कविता अहले वतन भी पढवाई हम लोगों को। रति सक्सेना ने कवितायें पिहरन तथा दीवारें लिखीं-

तुम आए
एक दीवार बन
तमाम खतरों का
सामना करने के लिये

धूप चमकी
मैं घिर गई दीवारों से

तुम उड़ गये कभी के
भाप बन
खतरे दीवारों के भीतर आ गये

इस महीने संभवतः सर्वाधिक तथा रोचक पोस्ट लिखीं अतुल ने। भैंस के दर्द से बात शुरु की, फोटो सेवाओं को जम के दुहते हुये‘विश लिस्ट’ बनायी। शंकरजी से गांव वालों की बातचीत पढ़कर लगा कि भगवान भी मजबूत शेयर पर दांव लगाते हैं। लोग प्रतीक्षा कर रहे थे भैंस के दर्द की कहानी सुनने के लिये पर अतुल फूट लिये बांके बिहारी को ‘गो कार्ट’ की सैर कराने। लौटे तो राजा का बाजा बजाने लगे। किस्सा-ए-बारात रोचक रहा, पर यह भी पता चलता है कैसे अतुल कामचोरी करते हैं तथा कहीं से भी पत्र न लगती कहानी पर अनुगूंज का ठप्पा लगा देते हैं।

पंकज ने बड़े दिनों के बाद तीन मूली के पराठे खा कर दो पोस्ट लिखी, देबाशीष के टैग वाले लेख की आगे की कड़ी के रूप में टैग की दुनिया से रूबरू कराया। विनय बता रहे हैं कि जब तक हम अपने गिरेबां में झांककर अपनी सेवाओं का विस्तार अपने लोगों तक नहीं करेंगे तथा सेवा की गुणवत्ता में में सुधार नहीं लायेंगे तब तक हमारा भला नहीं होगा।

भोपाली भाई दुविधा में दिखे जब बात आयी आपरेटिंग सिस्टम खरीदने की। इसे वे बुद्घत्व तक पहुंचा कर चिंता मुक्त हो गये। बौद्ध धर्म में रुचि रखने वाले हेमंत पंचतंत्रनुमा लघुकथायें सुनाते हुये बताते हैं-

“घोड़ा जब दौड़ने को तत्पर हो तो चाबुक की छाया भी काम कर जाती है”

ठेलुहई की परम्परा के बारे में बताते हुये फुरसतिया पहुंच गये अपने यार की बारात में जहां दूल्हा नजर आया उन्हें बांगड़ू कोलाज-

पर बारात का केन्द्रीय तत्व तो दूल्हा होता है। जब मैं किसी दूल्हे को देखता हूं तो लगता है कि आठ-दस शताब्दियां सिमटकर समा गयीं हों दूल्हे में। दिग्विजय के लिये निकले बारहवीं सदी के किसी योद्धा की तरह घोड़े पर सवार। कमर में तलवार, किसी मुगलिया राजकुमार की तरह मस्तक पर सुशोभित ताज (मौर), आंखों के आगे बुरकेनुमा फूलों की लड़ी – जिससे यह पता लगाना मुश्किल कि घोड़े पर सवार शख्स रजिया सुल्तान हैं या वीर शिवाजी, पैरों में बिच्छू के डंकनुमा नुकीलापन लिये राजपूती जूते और इक्कीसवीं सदी के डिजायनर सूट के कपड़े की बनी वाजिदअलीशाह के समय की पोशाक। गोद में कंगारूनुमा बच्चा (सहबोला) दबाये दूल्हे की छवि देखकर लगता है कि कोई सजीव ‘बांगड़ू कोलाज’ चला आ रहा है।

अब कुछ बात अंग्रेज़ी चिट्ठों की। हथियारों की होड़ में दुनिया पागलों की तरह दौड़ रही है। जितना हम इस पागलपन से बचेंगे, विकास के रास्ते आसान होते जायेंगे बताते हैं अतानु डे। अपने मित्र के नवजात शिशु को दुनिया में आने पर शुभकामना संदेश के बहाने वे अपने आपको पहचानने की बात कहते हैं। ज्ञान की परिभाषा बताते हुये गौतम घोष इन्फोसिस की कुल मानव संपदा के बारे में जानकारी देते हैं। हाइड्रोजन से चलने वाली कार के बारे में जानकारी देते हुये मनमोहनी सरकार के एक साल पूरा करने पर खुद को ६/१० नंबर देने पर अपना दृष्टिकोण बता रहे हैं इंद्र शर्मा।

हनुमानजी की पूजा करनी हो तो चलिये सेपिया के ब्लॉग पर। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर फिल्म बनी नहीं कि विवाद शुरु हो गये बता रहे हैं अमरदीप। हेमन्त अपनी मनपसंद किताब के हवाले से साफ्टवेयर के सिद्धांत बता रहे हैं।

जो है और जो चाहते हैं के बीच दूरी हमेशा बनी रहती है कुछ यही बताती है यह कविता। किसी का लिखा पढ़कर बहुत लोग सोचते हैं कि वे उससे बेहतर लिख सकते हैं। पर लिखना और सोचना अलग बातें हैं। अपनी सोच को जस का तस लिख पाना आसान तो नहीं होता। विस्तार से जानना है इस तथ्य को तो ये लेख पढ़ें। सूचना तथा अनुभव के अंतर की व्याख्या करते हैं प्रो.रमेश जैन जिन्होंने अपने सकुशल बचने का साल पूरा किया।

साफ्टवेयर की शादी करा के सदगोपन जायजा लेते हैं मोनोब्लॉग, ग्रुपब्लॉग आदि का। भारतीय ब्लॉग मंडल की विज्ञान वार्ता का ब्यौरा देखते हुये सोचते रहे कि हमारा चिट्ठा ज्ञान-विज्ञान कब दिखेगा यहाँ? ब्लॉगरों का जमावड़ा होगा तो खबर भी बनेगी। बंगलौर के ब्लॉगर देखिये यहां जिसके बारे में खबर है यहां इसी से तमाम दूसरी कड़ियां भी जुड़ीं हैं।

बम्बई, बुरका, आइसक्रीम एक साथ देखनी हो तो आइये यजद की दुकान पर। आतंकवाद से कम खतरनाक नहीं है एड्‌स, कह रहे हैं नितिन पई। मार्केट रिसर्च का नजारा देखने का मन करे तो देखिये चारुकेसी की नजर से। कलकत्ते का नजारा देखना हो, जल्दी में ढेर सारा देखना हो, मुर्गा बिल्ली प्यारा देखना हो, तो दीपक की शरण लें।

खुदा की बनायी तितलियां क्या इतनी खूबसूरत होती हैं जितना नीलेश काकैमरा देखता है! डाक्टरी की पढ़ाई कितनी कठिन है जानिये इंजीनियर गौरव से। ऐसा तमिलनाडु में ही होता है यह बात हो रही थी चाय के अड्डे पर। दुनिया कैसे खत्म होगी ये तो रविकिरन ही बता सकते हैं।

भारत सरकार मेहरबान होने की सोच रही है ब्लॉगरों तथा नेट पर लिखने वालों पर यह बताते हुये दीना मेहता दिखा रही हैं गांव की तस्वीरकिरुबा शंकर बता रहे हैं खूबसूरत तस्वीर के बहाने ब्लॉगिंग का मतलब। इसके अलावा वे बताते हैं ब्लॉग से पैसा बनाने का तरीका तथा बंगलौर मैराथन का किस्सा।

आदमी की इज्जत करना भगवान की पूजा करने के समान है यह मानना है अलका द्विवेदी का। अपनी खुद की साइट पर ब्लॉग कैसे शुरु किये जायें यह जानकारी चेतन से मिलती है। अमित वर्मा के ब्लॉग पर जानकारी मिली तमाम उन ब्लॉग पोस्ट की जिनको आप पढ़ना चाहेंगे। वे बताते हैं कि अपने ब्लॉग में टिप्पणी की सुविधा किसलिये नहीं दी है उन्होंने। पैट्रिक बताते हैं कुछ महिलाओं के लिखे ब्लॉग के बारे में जिनकी रुचि राजनीति में है।

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1 Response to बांगड़ू कोलाज और चाबुक की छाया

  1. manoj कहते हैं:

    सच्चाई भले ही वह कितनी भी कविता है . वरना तो कविता के नाम पर आत्मप्रशस्ति और अर्धसत्य ही अधिक लिखे जाते रहे हैं . इस बंद और ढोंगी समाज में साहस का समर्थन और सराहना भी कम बड़ा साहस नहीं है .क्या आप ए सब चाप ने के लिए उपयोग quillpad.in/hindiकिया

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